इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: विभाग की देरी के कारण कर्मचारी को सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता

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आगरा/प्रयागराज।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के हक में एक बड़ा विधिक सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा है कि सेवा विनियमितीकरण (Regularization) में विभाग द्वारा की गई देरी के लिए कर्मचारी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने आदेश दिया है कि यदि कोई कर्मचारी नियमतः नियमित होने का हकदार है, तो विभाग उसे पिछली तिथि से लाभ देने से इंकार नहीं कर सकता।

क्या है पूरा मामला ?

यह मामला नगर निगम प्रयागराज में कार्यरत अवर अभियंता (सिविल) राम सक्सेना से जुड़ा है।

* याची को 7 मार्च 1995 को उत्तर प्रदेश पालिका (केंद्रीकृत) सेवा नियमावली, 1966 के तहत तदर्थ रूप से नियुक्त किया गया था।

* नियमानुसार, 30 जून 1998 से पहले नियुक्त और 3 वर्ष की निरंतर सेवा पूरी करने वाले कार्मिकों को 10 अप्रैल 2003 से नियमित किया जाना चाहिए था।

* विभाग ने अन्य समान कर्मचारियों को तो समय पर नियमित कर दिया, लेकिन याची का विनियमितीकरण काफी विलंब से 3 नवंबर 2015 को किया गया।

अदालत में दी गई दलीलें:

याची के अधिवक्ता रामकुमार सिन्हा ने दलील दी कि याची की सेवाओं के नियमितीकरण में देरी के लिए पूर्ण रूप से विभाग जिम्मेदार है।

विभाग की इस विफलता का खामियाजा कर्मचारी को अपनी वरिष्ठता और पेंशन लाभ खोकर नहीं भुगतना चाहिए।

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हाईकोर्ट का निर्णय और निर्देश:

न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान ने याचिका को स्वीकार करते हुए विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाया।

कोर्ट ने निम्नलिखित आदेश जारी किए:

* बैक डेट से नियमितीकरण: याची को 3 नवंबर 2015 के बजाय 10 अप्रैल 2003 की तिथि से नियमित माना जाए।

* वरिष्ठता का पुनर्निर्धारण: विभाग को निर्देश दिया गया है कि वह याची की वरिष्ठता सूची (Seniority List) को नए सिरे से निर्धारित करे।

* वित्तीय व पेंशन लाभ: अदालत ने ‘चंद्र मोहन यादव’ केस के नजीर का हवाला देते हुए आदेश दिया कि याची को पुरानी पेंशन योजना सहित अन्य सभी सेवाजनित वित्तीय लाभ प्रदान किए जाएं।

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कोर्ट की टिप्पणी:

सेवा विनियमितीकरण में हुई देरी विभाग की प्रशासनिक चूक है, जिसका दंड कर्मचारी को नहीं मिलना चाहिए।

केस फाइल:

* याचिकाकर्ता: राम सक्सेना (अवर अभियंता, नगर निगम प्रयागराज)

* अदालत: इलाहाबाद हाईकोर्ट (न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान)

* मुख्य बिंदु: 10 अप्रैल 2003 से नियमित मानने और पुरानी पेंशन बहाल करने का आदेश।

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मनीष वर्मा
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