दीर्घकालिक सहमति जन्य संबंधों को बलात्कार नहीं माना जा सकता, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही की रद्द

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आगरा/प्रयागराज।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला और पुरुष के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से शारीरिक संबंध रहे हों, और शुरुआत से ही शादी का इरादा न होने का कोई पुख्ता सबूत मौजूद न हो, तो ऐसे संबंधों को बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है।

अदालत ने इस टिप्पणी के साथ ही गोरखपुर के पिपराइच थाने में दर्ज एक प्राथमिकी और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया है।

यह आदेश जस्टिस विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने संजय उर्फ संजय कश्यप की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

मामले के अनुसार, पीड़िता ने आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता ने शादी का झांसा देकर लगभग एक वर्ष तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। याचिका में यह भी उल्लेख था कि दोनों के परिवारों को इस रिश्ते की पूरी जानकारी थी।

हालांकि, बाद में किन्हीं कारणों से शादी नहीं हो सकी, जिसके बाद पीड़िता ने २६ मार्च २०२४ को गोरखपुर के पिपराइच थाने में मारपीट और जबरन संबंध बनाने के आरोपों के तहत विभिन्न धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कराई थी।

पुलिस ने मामले की जांच पूरी कर अदालत में चार्जशीट भी दाखिल कर दी थी। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के समक्ष तर्क दिया कि यह मामला आपसी सहमति से बने संबंधों का है और शादी न हो पाने के कारण इसे बलात्कार का रूप दे दिया गया।

हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने और मामले के तथ्यों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि लंबे समय तक चले सहमति के संबंधों को शादी का वादा टूटने पर सीधे तौर पर बलात्कार नहीं ठहराया जा सकता, बशर्ते यह साबित न हो कि पुरुष का इरादा शुरू से ही धोखा देने का था।

अदालत ने माना कि इस मामले में ऐसी कोई मंशा दिखाई नहीं देती। इसके साथ ही कोर्ट ने मामले को रद्द करने का आदेश जारी कर दिया।

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मनीष वर्मा
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