आगरा/प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में स्पष्ट किया है कि दो बालिग व्यक्तियों द्वारा आपसी सहमति से किए गए विवाह की जांच करना पुलिस का अधिकार क्षेत्र नहीं है।
अदालत ने कहा कि पुलिस का मुख्य दायित्व अपराधों की जांच करना है, न कि अपनी मर्जी से विवाह करने वाले बालिग जोड़ों के निजी जीवन में हस्तक्षेप करना।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने भदोही जिले में दर्ज एक एफआईआर को रद्द करते हुए यह आदेश पारित किया।
इस मामले में युवती के पिता ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 87 के तहत युवक पर अपहरण और जबरन शादी कराने का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज कराया था।
याचिकाकर्ता दंपति ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए बताया कि वे दोनों बालिग हैं और उन्होंने 18 फरवरी 2026 को अपनी स्वेच्छा से विवाह किया है।
उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि युवती का परिवार और स्थानीय पुलिस उन्हें अलग करने का अनुचित प्रयास कर रहे हैं।

सुनवाई के दौरान युवती ने स्वयं अदालत में उपस्थित होकर स्पष्ट रूप से बयान दिया कि उसने अपनी मर्जी से शादी की है और वह अपने पति के साथ ही अपना जीवन बिताना चाहती है।
युवती के इस स्पष्ट बयान के बावजूद पुलिस द्वारा जांच जारी रखने और उसका दोबारा बयान दर्ज करने की जिद पर हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की।
अदालत ने पुलिस की इस कार्रवाई को कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग और संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत नागरिकों को मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का गंभीर उल्लंघन करार दिया।
न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा कि जब कथित पीड़िता स्वयं उच्च न्यायालय के समक्ष अपना रुख स्पष्ट कर चुकी है, तो पुलिस द्वारा फिर से बयान लेने या कोई अलग निष्कर्ष निकालने का कोई विधिक औचित्य नहीं रह जाता।
अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में पुलिस का रवैया निष्पक्ष नहीं था और ऐसा प्रतीत होता है कि वह सीधे तौर पर युवती के पिता का पक्ष ले रही थी।
इन सख्त टिप्पणियों के साथ, हाईकोर्ट ने दर्ज एफआईआर को पूरी तरह निरस्त कर दिया। इसके साथ ही, अदालत ने भदोही के पुलिस अधीक्षक और सुरियावां थाने के प्रभारी को संयुक्त रूप से युवती को 1,000/- रुपये तथा युवती के पिता को 5,000/- रुपये की लागत (जुर्माना) अदा करने का आदेश दिया।
अदालत ने यह भी कड़ा निर्देश दिया है कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर यह राशि जमा नहीं की जाती है, तो इसकी वसूली भू-राजस्व के बकाए की तरह की जाएगी।
अंत में, कोर्ट ने संबंधित थाने को अपनी जनरल डायरी (जीडी) में इस एफआईआर के निरस्त किए जाने की आधिकारिक प्रविष्टि दर्ज करने का भी निर्देश दिया है।
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