राज्यपाल की समय से पहले रिहाई की शक्ति मनमानी नहीं, अदालत की अनुमति के बिना आदेश रद्द

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आगरा/प्रयागराज।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने समय से पहले कैदियों की रिहाई के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

अदालत ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को कैदियों की समय से पहले रिहाई का अधिकार प्राप्त है, किंतु इस संवैधानिक शक्ति का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता है।

यह अधिकार निर्धारित नियमों और सरकार की सजा में छूट यानी रेमिशन की नीति के दायरे में ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

यह निर्णय न्यायमूर्ति जे.ई. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ द्वारा राम प्रताप सिंह की याचिका पर दिया गया।

मामले के अनुसार, वर्ष 2002 में फतेहपुर के अपर सत्र न्यायाधीश ने हत्या के प्रयास के मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 307/34 के तहत दोषी पाते हुए याचिकाकर्ता को सात साल की कठोर कारावास और दो हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

वर्ष 2019 में उनकी अपील खारिज हो गई थी और सर्वोच्च न्यायालय से भी उन्हें राहत नहीं मिली थी।

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सितंबर 2022 में जेल प्रशासन और फतेहपुर के जिलाधिकारी के समक्ष राम प्रताप सिंह की समय से पहले रिहाई का प्रस्ताव भेजा गया था।

जेल रिकॉर्ड के अनुसार, उन्होंने बिना किसी छूट के चार साल, छह महीने और छह दिन की सजा पूरी कर ली थी, जबकि छूट को शामिल करने पर उनकी जेल की अवधि पांच साल, चार महीने हो चुकी थी।

इसके अतिरिक्त, जेल में उनका आचरण भी संतोषजनक पाया गया था।

तथापि, जून 2025 में उनकी समय से पहले रिहाई की याचिका को अस्वीकार कर दिया गया, जिसमें उनकी जेल की अवधि मात्र दो साल, छह दिन दर्शाई गई थी। हाईकोर्ट ने अभिलेखों का अवलोकन करने के पश्चात इसे एक गंभीर और स्पष्ट त्रुटि माना।

अदालत ने रेखांकित किया कि उत्तर प्रदेश कैदी प्रोबेशन पर रिहाई नियम, 1938 के अंतर्गत संबंधित श्रेणी का बंदी बिना छूट के अपनी सजा का एक-तिहाई हिस्सा पूर्ण करने के बाद समय से पहले रिहाई का पात्र बन जाता है।

याचिकाकर्ता कुल सात वर्ष की सजा में से बिना छूट के ही चार साल, छह महीने से अधिक समय तक कारावास में व्यतीत कर चुका था।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, हाईकोर्ट ने 26 जून 2025 को रिहाई से इनकार करने वाले आदेश को निरस्त कर दिया तथा शासन को नए सिरे से इस मामले पर विचार करने का निर्देश दिया।

अदालत ने आदेश दिया कि निर्णय की प्रति प्राप्त होने के एक महीने के भीतर याचिकाकर्ता की समय से पहले रिहाई के आवेदन पर पुन: निर्णय लिया जाए।

इस न्यायिक आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि अनुच्छेद 161 के अंतर्गत प्रदत्त राज्यपाल की शक्तियां व्यापक होने के बावजूद तथ्यों, अभिलेखों और नियमों की उचित संवीक्षा के अधीन हैं।

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मनीष वर्मा
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