मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट आगरा का महत्वपूर्ण फैसला
आगरा ।
आगरा की मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत ने पैतृक संपत्ति पर अवैध कब्जा करने की नीयत से फर्जी और कूट रचित दस्तावेज तैयार करने के मामले में एक बड़ा निर्णय सुनाया है।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, आगरा माननीय शारिब अली ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दोषी अभियुक्त आशीष को सात वर्ष के साधारण कारावास और कुल दस हजार रुपये के अर्थदंड की सजा से दंडित किया है।
इस मामले के मुख्य अभियुक्त रामवली की दौरान विचारण मृत्यु हो जाने के कारण उसके खिलाफ अदालती कार्यवाही को पूर्व में ही उपशमित किया जा चुका था।
जानिये क्या था पूरा मामला ?
यह कानूनी विवाद वर्ष 2009 में तब शुरू हुआ जब आगरा के कौशलपुर निवासी गौतम प्रकाश, नीलम और श्रीमती लक्ष्मी गौतम ने थाना न्यू आगरा में एक प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया।
शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि मोहल्ला भट्टा देवीदास, जगनपुर स्थित उनकी लगभग 20 क्वार्टरों वाली पैतृक संपत्ति पर कुछ दबंग तत्वों द्वारा अवैध रूप से कब्जा करने का प्रयास किया जा रहा था। पीड़ित पक्ष के अनुसार, उक्त संपत्ति से जुड़े विभिन्न दीवानी मामलों और अपीलों के फैसले पहले ही उनके हक में आ चुके थे।
आरोप लगाया गया कि रामबली नामक व्यक्ति ने एक आपराधिक षड्यंत्र के तहत शिकायतकर्ताओं के दो मंजिला मकान का एक फर्जी व कूट रचित बैनामा श्रीमती रेखा शर्मा के पक्ष में निष्पादित कर दिया। इस अवैध कृत्य और साजिश में रामबली का पुत्र आशीष, राजीव दीक्षित और मोहित शर्मा भी पूरी तरह सहभागी थे।
आरोपियों ने शिकायतकर्ताओं के किराएदार नत्थीलाल उर्फ नथुआ को डरा-धमकाकर मकान खाली करा लिया और उस पर जबरन अपना ताला लगा दिया।

पुलिस जांच और न्यायालय की कार्यवाही:
पीड़ित पक्ष की तहरीर पर थाना न्यू आगरा में मुकदमा अपराध संख्या 1083/2009 दर्ज किया गया। मामले की विवेचना उपनिरीक्षक आर. के. सिंह द्वारा की गई।
जांच के दौरान विवेचक ने घटनास्थल का निरीक्षण कर नक्शा नजरी तैयार किया और गवाहों के बयान दर्ज किए। विवेचना के दौरान सह-आरोपी रेखा शर्मा, मोहित शर्मा और राजीव दीक्षित की नामजदगी गलत पाई गई, जिसके बाद उनका नाम केस से हटा दिया गया।
अंततः पुलिस ने मुख्य साजिशकर्ता रामबली और उसके पुत्र आशीष के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420, 467, 468, 471 और 120बी के तहत न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया।
न्यायालय द्वारा दिसंबर 2010 में अभियुक्तों के खिलाफ आरोप तय किए गए। विचारण के दौरान अभियुक्त रामबली की मृत्यु हो जाने के कारण जनवरी 2017 में उसके विरुद्ध कार्यवाही समाप्त कर दी गई और पूरा मुकदमा आशीष के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा।
अदालत में गवाहों के बयान और जिरह:
अभियोजन पक्ष ने अपने दावों को साबित करने के लिए मुख्य गवाह के रूप में वादी गौतम प्रकाश और विवेचक आर. के. सिंह को अदालत में परीक्षित कराया।
गौतम प्रकाश ने अदालत को बताया कि उनके पिता देवीदास ने वर्ष 1966 में ही यह जमीन उनके नाना भजनलाल के पक्ष में हस्तांतरित कर दी थी, जिन्होंने बाद में वसीयत के जरिए यह संपत्ति उनके नाम कर दी।
अभियोजन का मुख्य तर्क यह था कि रामबली और आशीष द्वारा वर्ष 1970 का एक कथित फर्जी बैनामा तैयार किया गया था, जिसमें विक्रेता का नाम ‘देवीदास पुत्र रेवतीराम’ दर्शाया गया था।
जबकि वास्तविक तथ्य यह था कि वादी के पिता का नाम ‘देवीदास पुत्र राजाराम’ था। इस प्रकार पिता का नाम बदलकर और जाली हस्ताक्षर कर एक पूरी तरह कूट रचित दस्तावेज तैयार किया गया, जिसमें आशीष ने गवाह के रूप में हस्ताक्षर किए थे।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह मामला पूरी तरह दीवानी प्रकृति का है और पुलिस ने किसी हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय या मूल दस्तावेज हासिल नहीं किए हैं।
हालांकि, अदालत ने माना कि केवल विशेषज्ञ की राय न होने से अभियोजन का मामला असत्य नहीं हो जाता, यदि सभी परिस्थितिजन्य साक्ष्य अपराध की ओर स्पष्ट इशारा करते हों।
न्यायालय का कानूनी विश्लेषण और दोषसिद्धि:
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अपने निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विभिन्न विधिक व्यवस्थाओं का संदर्भ लिया।
अदालत ने पाया कि अभियुक्त आशीष केवल एक औपचारिक गवाह नहीं था, बल्कि वह इस फर्जी लेनदेन की पूरी श्रृंखला से भली-भांति परिचित था और आपराधिक षड्यंत्र में शामिल था।
अदालत ने आरोपी आशीष को आईपीसी की धारा 467 (मूल्यवान प्रतिभूति की कूटरचना), धारा 468 (छल के प्रयोजन से कूटरचना) और धारा 120बी (अपराधिक षड्यंत्र) के तहत दोषी पाया।
हालांकि, प्रत्यक्ष साक्ष्य के अभाव में न्यायालय ने उसे धारा 420 (छल करना) और धारा 471 (कूट रचित दस्तावेज का असली के रूप में प्रयोग) के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया, क्योंकि यह सिद्ध नहीं हो सका कि आरोपी ने स्वयं इस दस्तावेज का इस्तेमाल किसी सरकारी कार्यालय या कोर्ट में किया था अथवा सीधे तौर पर संपत्ति की सुपुर्दगी प्राप्त की थी।
सुनाया गया दण्डादेश:
दोषसिद्धि के बाद लंच के उपरांत अदालत ने सजा के बिंदु पर सुनवाई की।
अभियोजन अधिकारी ने संपत्ति संबंधी इस गंभीर अपराध के लिए कड़े दंड की मांग की, जबकि बचाव पक्ष के वकील ने आरोपी के किसी पूर्व आपराधिक इतिहास न होने और परिवार का इकलौता भरण-पोषण करने वाला सदस्य होने का हवाला देते हुए उदारता की प्रार्थना की।
न्यायालय ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपने आदेश में कहा कि कूट रचित दस्तावेजों के माध्यम से किसी की पैतृक संपत्ति पर अवैध अधिकार स्थापित करने का प्रयास समाज और कानून व्यवस्था के विरुद्ध एक गंभीर अपराध है, इसलिए अभियुक्त किसी भी प्रकार की उदारता का पात्र नहीं है।
अदालत ने निम्नलिखित दण्डादेश पारित किया:
* आईपीसी की धारा 467 के तहत दोषी आशीष को 07 वर्ष का साधारण कारावास और 4,000/- रुपये का अर्थदंड सुनाया गया। अर्थदंड न देने पर 07 दिन का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
* आईपीसी की धारा 468 के तहत उसे 03 वर्ष का साधारण कारावास और 4,000/- रुपये का अर्थदंड दिया गया। अर्थदंड न देने पर 07 दिन का अतिरिक्त कारावास तय किया गया।
* आईपीसी की धारा 120बी के तहत उसे 03 वर्ष का साधारण कारावास और 2,000/- रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई गई। अर्थदंड न चुकाने पर 03 दिन का अतिरिक्त कारावास काटना होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियुक्त को सुनाई गई ये सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।
साथ ही, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 428 के तहत अभियुक्त द्वारा विचारण के दौरान जेल में बिताई गई अवधि को उसकी मुख्य सजा में समायोजित किया जाएगा।
आदेश के तत्काल बाद अभियुक्त आशीष को न्यायिक अभिरक्षा में लेकर सजा भुगतने हेतु जेल भेज दिया गया।
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