आगरा/प्रयागराज:
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक आदेश में स्पष्ट किया है कि प्रत्येक बालिग व्यक्ति को, चाहे उसकी लैंगिक पहचान (Gender Identity) कुछ भी हो, अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने और जीवनसाथी चुनने का मौलिक अधिकार है।
न्यायालय ने एक ट्रांसजेंडर और उनके साथी के लिव-इन रिलेशनशिप को संरक्षण प्रदान करते हुए पुलिस को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह मामला उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद (मझोला थाना क्षेत्र) का है। याचिकाकर्ताओं (एक ट्रांसजेंडर और उनके पुरुष साथी) ने हाईकोर्ट की शरण लेते हुए बताया कि वे दोनों बालिग हैं और अपनी मर्जी से साथ रह रहे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि उनके परिजनों से उनके जीवन और स्वतंत्रता को खतरा है। स्थानीय पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगाने के बावजूद कोई कार्रवाई न होने पर उन्होंने रिट याचिका दाखिल की थी।
न्यायालय की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ:
न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया:
* अनुच्छेद 21 की सर्वोच्चता: कोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसमें अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनना भी शामिल है।

* सुप्रीम कोर्ट के नजीरों का हवाला: पीठ ने ‘नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ (2018)’ मामले का जिक्र किया, जिसने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर किया था। साथ ही, ‘अकांक्षा बनाम यूपी राज्य (2025)’ के नवीनतम संदर्भ में स्पष्ट किया कि विवाह न होने की स्थिति में भी लिव-इन जोड़ों के अधिकार सुरक्षित हैं।
* समाज और परिवार का हस्तक्षेप: कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि एक बार जब दो बालिग व्यक्ति साथ रहने का निर्णय ले लेते हैं, तो परिवार या समाज को उनके शांतिपूर्ण जीवन में बाधा डालने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
पुलिस और प्रशासन को निर्देश:
न्यायालय ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को स्पष्ट आदेश दिए हैं:
* तत्काल सुरक्षा: यदि याचिकाकर्ताओं के जीवन में कोई बाधा उत्पन्न होती है, तो संबंधित पुलिस कमिश्नर या एसएसपी उन्हें तुरंत सुरक्षा प्रदान करेंगे।
* आयु सत्यापन: यदि आयु को लेकर कोई विवाद हो और दस्तावेजी साक्ष्य न हों, तो पुलिस ‘ऑसिफिकेशन टेस्ट’ (Ossification Test) के जरिए उम्र का सत्यापन कर सकती है।
* दबाव पर रोक: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है, तो पुलिस इन जोड़ों के विरुद्ध कोई दंडात्मक या जबरन कार्रवाई नहीं करेगी।
यकीनन हाईकोर्ट का यह फैसला न केवल ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों को मजबूती देता है, बल्कि यह भी रेखांकित करता है कि “शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व” (Peaceful Co-existence) लोकतंत्र का मूल आधार है।
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