इलाहाबाद हाईकोर्ट में बुलडोजर कार्रवाई पर खंडित फैसला, फैसले में राम मंदिर चंदा विवाद और भ्रष्टाचार का जिक्र

उच्च न्यायालय मुख्य सुर्खियां

आगरा/प्रयागराज।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में बुलडोजर कार्रवाई से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान भ्रष्टाचार और सार्वजनिक नैतिकता को लेकर की गई एक महत्वपूर्ण टिप्पणी चर्चा के केंद्र में है।

हालांकि, मामले की सुनवाई कर रही खंडपीठ के दोनों न्यायाधीशों के बीच सहमति न बन पाने के कारण अब यह मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया गया है।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अतुल श्रीधरन ने अपने फैसले में देश में गिरते नैतिक मूल्यों और भ्रष्टाचार पर गहरी चिंता व्यक्त की।

उन्होंने राम मंदिर में चंदे की कथित चोरी से जुड़े विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि आस्था के सर्वोच्च केंद्र में चंदे की चोरी जैसे आरोप भी समाज को विचलित नहीं करते हैं, तो यह सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी के पतन को दर्शाता है।

न्यायालय ने इस स्थिति को सामाजिक और संस्थागत नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला बताया।

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बुलडोजर की कार्रवाई और अवैध निर्माण की प्रक्रिया पर सख्त टिप्पणी करते हुए जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि भ्रष्टाचार की जड़ें अत्यंत गहरी हो चुकी हैं।

व्यवस्था की विडंबना यह है कि पहले रिश्वत लेकर अवैध निर्माण होने दिए जाते हैं और वर्षों बाद उसी निर्माण पर दंडात्मक कार्रवाई की जाती है।

उन्होंने भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए कड़े कानून की आवश्यकता बताते हुए भ्रष्ट अधिकारियों के लिए सख्त दंड का सुझाव दिया।

इस फैसले के विधिक परिणाम के संदर्भ में, खंडपीठ के दूसरे सदस्य जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने जस्टिस श्रीधरन के फैसले के कई हिस्सों से अपनी विधिक असहमति दर्ज कराई।

दोनों न्यायाधीशों की अलग-अलग राय (खंडित फैसला) होने के कारण न्यायिक प्रक्रिया के तहत मामला अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को संदर्भित कर दिया गया है।

अब मुख्य न्यायाधीश इस प्रकरण को अंतिम निर्णय के लिए किसी तीसरे न्यायाधीश या नई पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करेंगे।

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मनीष वर्मा
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