आगरा।
चंबल नदी के किनारे शव मिलने और हत्या के एक मामले में जिला जज माननीय संजय कुमार मलिक की अदालत ने साक्ष्य के अभाव में तीन आरोपियों को दोषमुक्त (बरी) करने का आदेश दिया है।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (सरकमस्टेंशियल एविडेंस) की कड़ियों को आपस में जोड़ने में पूरी तरह विफल रहा है।
घटनाक्रम और मामला:
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 6 दिसंबर 2014 को थाना मनसुखपुरा (आगरा) के अंतर्गत ग्राम करकोली के चौकीदार बंटी पुत्र पप्पू दिवाकर ने पुलिस को सूचना दी थी कि चंबल नदी के किनारे एक अज्ञात व्यक्ति का शव पड़ा है।

सूचना पर पहुंची पुलिस ने पंचायतनामा की कार्रवाई कर शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेजा था। बाद में मृतक की पहचान कल्याण सिंह द्वारा अपने भाई रामरथ उर्फ रामा के रूप में की गई थी।
पुलिस जांच और आरोप पत्र:
पुलिस जांच में यह बात सामने आई कि मृतक रामरथ को अंतिम बार भैंस खरीदने के लिए आरोपी बनिया उर्फ नरेंद्र (निवासी ग्राम बाबरपुर, थाना राजाखेड़ा, जिला धौलपुर, राजस्थान), धर्मेंद्र (निवासी ग्राम करकोली, थाना मनसुखपुरा, आगरा) और भीकम (निवासी ग्राम बड़ा पुरा, थाना मनसुखपुरा, आगरा) के साथ देखा गया था।
पुलिस ने ‘लास्ट सीन’ (अंतिम बार साथ देखे जाने) के आधार पर तीनों आरोपियों के विरुद्ध अदालत में हत्या का आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया था।
बचाव पक्ष के तर्क और अदालत का फैसला:
मामले की सुनवाई के दौरान आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रकाश नारायण शर्मा एवं जय नारायण शर्मा ने पैरवी की।
बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि केवल अंतिम बार साथ देखे जाने के आधार पर किसी को हत्या का दोषी नहीं ठहराया जा सकता और अभियोजन की कहानी में कड़ियों का अभाव है।
जिला जज ने पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करने और दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामलों में अपराध साबित करने के लिए घटना की कड़ियों का अटूट होना अनिवार्य है।
इस मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्य की कड़ियां आपस में न जुड़ने और ठोस साक्ष्यों के अभाव में अदालत ने तीनों आरोपियों को बरी करने का आदेश सुनाया।
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