आगरा/प्रयागराज।
एनआईए के पुलिस उपाधीक्षक तंजील अहमद और उनकी पत्नी फरजाना की सनसनीखेज हत्या के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक मोड़ पर नया आदेश दिया है।
मामले की गंभीरता और पूर्व के फैसलों में आई विधिक असमानता को देखते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस प्रकरण को अब बड़ी बेंच यानी लार्जर बेंच को संदर्भित कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित तीन जजों की यह विशेष बेंच अब दोषी रैयान की फांसी की सजा पर अंतिम निर्णय लेगी।
विधिक मतभेद के कारण बदला घटनाक्रम:
इलाहाबाद हाईकोर्ट में यह अपने आप में एक अनोखा मामला है जहां ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई फांसी की सजा के खिलाफ अपील पर जजों के विचारों में एकमत न होने के कारण मामला बड़ी बेंच को सौंपा गया है।
इससे पूर्व अप्रैल के प्रथम सप्ताह में हाईकोर्ट की एक एकल पीठ ने रैयान की फांसी की सजा को रद्द करने का आदेश दिया था, जिसके बाद वह जेल से रिहा हो गया था।
हालांकि, शुक्रवार को डिवीजन बेंच ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 393 के तहत इस मामले को विस्तृत सुनवाई के लिए तीन सदस्यीय पीठ के पास भेजने का निर्णय लिया है।
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बिजनौर की वह काली रात:
उल्लेखनीय है कि यह मामला 2 अप्रैल 2016 का है, जब बिजनौर के स्योहारा क्षेत्र में एनआईए के डीएसपी तंजील अहमद और उनकी पत्नी की गोली मारकर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।
इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने मुख्य आरोपी मुनीर और रैयान को दोषी करार देते हुए मृत्युदंड सुनाया था। अपील के दौरान सह-आरोपी मुनीर की मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद रैयान ने कानूनी लड़ाई जारी रखी।
दोषी की कस्टडी पर उठ सकते हैं सवाल:
शिकायतकर्ता के अधिवक्ताओं के अनुसार, चूंकि डिवीजन बेंच ने मामले को लार्जर बेंच को भेज दिया है, इसलिए एकल पीठ का पूर्व का फैसला अब प्रभावी नहीं माना जाएगा।
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कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि लार्जर बेंच का अंतिम फैसला आने तक ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा की स्थिति तकनीकी रूप से बनी रहेगी।
ऐसी स्थिति में रैयान को पुनः हिरासत में लेने के लिए लार्जर बेंच के समक्ष दलीलें पेश की जा सकती हैं।
अब सभी की निगाहें मुख्य न्यायाधीश द्वारा गठित होने वाली तीन जजों की पीठ पर टिकी हैं, जो इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड में इंसाफ की अंतिम रूपरेखा तय करेगी।
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