आगरा:
छोटी-छोटी बातों और सहनशक्ति की कमी के कारण आज परिवार टूट रहे हैं। अहंकार की लड़ाई परिवारों के बिखरने की एक बड़ी वजह बन रही है, और इसका सीधा असर अदालतों में बढ़ रहे मुकदमों की संख्या पर देखा जा सकता है।
जनपद में पारिवारिक मामलों की सुनवाई के लिए पांच परिवार न्यायालय कार्यरत हैं, जिनमें मुख्य परिवार न्यायाधीश सहित सभी अदालतों में मुकदमों की भरमार है।
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एक ऐसा ही मामला लखनऊ की एक युवती और आगरा के रोहता के एक युवक का है, जिनकी शादी 2023 में हुई थी। शादी के मात्र दो महीने बाद ही वैचारिक मतभेदों के चलते दोनों अलग रहने लगे और आखिरकार उन्होंने तलाक के लिए अदालत में याचिका दायर कर दी। पत्नी ने एकमुश्त राशि लेकर तलाक की सहर्ष अनुमति दे दी।
इस मामले में पति के वकील शैलेंद्र पाल सिंह ने बताया कि परिवार न्यायाधीश द्वारा विवाह विच्छेद से पहले मामले को मीडिएशन सेंटर में मध्यस्थता के लिए भेजा जाता है, ताकि परिवारों को टूटने से बचाया जा सके।
हालांकि, काउंसलर के तमाम प्रयासों के बावजूद दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहते हैं और अपनी गलती मानने को तैयार नहीं होते।

यह भी देखने में आता है कि महिलाओं के पक्ष में कई कानून होने के कारण वे भी आसानी से झुकने को तैयार नहीं होतीं। ऐसी स्थिति में, वकील शैलेंद्र पाल सिंह यह सवाल उठाते हैं कि क्या इस बात की कोई गारंटी है कि तलाक के बाद दोनों पक्ष जब दोबारा शादी करेंगे, तो उन्हें बेहतर जीवनसाथी मिलेंगे?
यह समस्या दिखाती है कि कैसे छोटी-छोटी बातें और अहंकार हमारे पारिवारिक ढांचे को कमजोर कर रहे हैं।
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