आगरा/प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के श्रम विभाग द्वारा संचालित ‘कर्मकार मृत्यु एवं विकलांगता सहायता योजना’ के तहत लाभ से वंचित किए जाने के मामले को गंभीरता से लिया है।
कोर्ट ने इस प्रकरण में राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार की एकल पीठ ने कृष्णपाल सिंह द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
मामले की पृष्ठभूमि:
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता प्रारब्ध पाण्डेय ने कोर्ट को बताया कि:
* याचिकाकर्ता की पत्नी एक पंजीकृत असंगठित श्रमिक थीं।
* उनकी मृत्यु के पश्चात, याचिकाकर्ता ने वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए 1 अप्रैल 2023 को निर्धारित योजना के तहत आवेदन किया था।
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* लंबे समय तक कार्रवाई न होने पर याचिकाकर्ता ने 5 जून 2024 को रिमाइंडर भेजा, जिसके जवाब में उन्हें 9 सितंबर 2025 को एक पत्र मिला।
प्रशासनिक चूक पर उठाए सवाल:
अधिवक्ता ने दलील दी कि विभाग द्वारा प्राप्त पत्र में यह तो बताया गया कि उनका आवेदन 17 सितंबर 2023 को ही निरस्त कर दिया गया था, लेकिन उस निरस्तीकरण आदेश की प्रति (Copy) साथ नहीं भेजी गई।
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मुख्य विवाद:
आदेश की प्रति उपलब्ध न होने के कारण याचिकाकर्ता को समय रहते यह पता ही नहीं चल सका कि उसका आवेदन क्यों खारिज हुआ, जिससे वह कानूनी समय सीमा के भीतर उसे चुनौती देने के अपने अधिकार से वंचित रह गया।
कोर्ट का रुख:
कोर्ट ने याचिकाकर्ता और सरकारी अधिवक्ता की दलीलें सुनने के बाद प्रक्रियात्मक पारदर्शिता की कमी को देखते हुए राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है।
मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।
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