आगरा/प्रयागराज:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि आपराधिक मुकदमों में आरोपों को बदलने या संशोधित करने का विशेषाधिकार केवल न्यायालय के पास है।
कोर्ट ने कहा कि CRPC की धारा 216 (अब BNSS की संबंधित धारा) के तहत न तो पीड़ित और न ही अभियोजन पक्ष अधिकार के तौर पर आरोप बदलने की मांग कर सकता है।
मामला क्या था ?
यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार-दशम की एकलपीठ ने ‘सिराज अली उर्फ बाबू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में दिया।
* घटना: 2013 के एक मामले में आरोपी सिराज पर पीड़ित को पकड़ने और सह-आरोपी पर गोली चलाने का आरोप था।
* निचली अदालत का फैसला: शुरुआत में धारा 324 (खतरनाक हथियार से चोट) के तहत आरोप तय हुए थे, लेकिन बाद में अभियोजन के आवेदन पर ट्रायल कोर्ट ने इसे धारा 307 (हत्या का प्रयास) में बदल दिया।
* चुनौती: आरोपी ने इस बदलाव को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ:
* न्यायालय का स्वविवेक: कोर्ट ने कहा कि धारा 216 अदालत को यह शक्ति देती है कि वह न्यायहित में किसी भी समय (फैसला सुनाए जाने से पहले) आरोपों को संशोधित कर सके।
* पक्षकारों की भूमिका: अभियोजन या पीड़ित केवल तथ्यों को अदालत के संज्ञान में ला सकते हैं, लेकिन वे “अधिकार” के रूप में संशोधन की मांग नहीं कर सकते। यह पूरी तरह से अदालत के स्वतंत्र विवेक पर निर्भर है।
* तथ्यों की प्रधानता: इस मामले में एक्स-रे रिपोर्ट में कोहनी के पास छर्रे मिलने और घायल गवाह के बयानों को देखते हुए हाईकोर्ट ने धारा 307 के तहत आरोप तय करने को सही माना।
निष्कर्ष:
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘पी. कार्तिकलक्ष्मी बनाम गणेश’ मामले का संदर्भ लेते हुए स्पष्ट किया कि भले ही अभियोजन को आवेदन का तकनीकी अधिकार न हो, लेकिन यदि न्यायालय को लगता है कि साक्ष्य गंभीर हैं, तो वह स्वयं आरोपों को बढ़ा या बदल सकता है। इसी के साथ कोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज कर दी।
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