आगरा/प्रयागराज:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि बैंक के ऐसे आंतरिक सर्कुलर (Internal Circulars), जिन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया है या जिनकी जानकारी मृतक कर्मचारी के परिजनों को नहीं है, उन्हें लाभ रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
न्यायालय ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को आदेश दिया है कि वह मृतक कर्मचारी के आश्रित की अनुग्रह राशि (Ex-gratia) के दावे पर तीन माह के भीतर सहानुभूतिपूर्वक पुनर्विचार करे।
प्रमुख घटनाक्रम और मामला:
यह आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने राजीव मिश्रा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
* पृष्ठभूमि: याची की माता, जो सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में कार्यरत थीं, का निधन अक्टूबर 2011 में हुआ था।
* विवाद: बैंक ने अनुग्रह राशि देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि आवेदन मृत्यु के 6 महीने के भीतर नहीं किया गया। बैंक ने इसके लिए अपने एक आंतरिक सर्कुलर का हवाला दिया था।
* कोर्ट की आपत्ति: हाईकोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जताई कि यदि समय-सीमा निकल चुकी थी, तो बैंक ने स्वयं परिवार को सूचित क्यों नहीं किया या आवेदन करने के लिए पत्र क्यों नहीं भेजा।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणियाँ:
* सार्वजनिक प्रसार अनिवार्य: अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी विभागीय सर्कुलर को सार्वजनिक रूप से प्रसारित न किया जाए, वह आम जनता या आश्रितों पर बाध्यकारी नहीं हो सकता।
* कल्याणकारी उद्देश्य: कोर्ट ने कहा कि अनुग्रह राशि का उद्देश्य संकटग्रस्त परिवार का कल्याण करना है। परिवार का कोई भी सदस्य इसके लिए दावा पेश कर सकता है।
* प्रशासनिक जवाबदेही: बैंक इस पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका कि उसने गोपनीय सर्कुलर की जानकारी परिवार को पहले क्यों नहीं दी।
अदालत का निर्देश:
हाईकोर्ट ने बैंक द्वारा दावा खारिज करने के पुराने आदेश को रद्द कर दिया है। बैंक को निर्देश दिया गया है कि वह 3 महीने में अनुग्रह राशि पर निर्णय ले और समय-सीमा की तकनीकी बाधा को आधार न बनाए। यदि किसी दस्तावेज की कमी है, तो आश्रित को 15 दिन में सूचित किया जाए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उन हजारों परिवारों के लिए एक मिसाल है जो तकनीकी नियमों और आंतरिक दिशानिर्देशों की जानकारी न होने के कारण अपने वाजिब हक से वंचित रह जाते हैं।
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