आगरा।
कानूनी प्रावधानों की अनदेखी कर सीधे सत्र न्यायालय (Sessions Court) का दरवाजा खटखटाने वाले आरोपियों को कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई है।
अपर जिला जज (ADJ-25) माननीय मदन मोहन ने थाना जगनेर के एक मामले में आरोपियों द्वारा प्रस्तुत अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र (Anticipatory Bail) को न केवल निरस्त कर दिया, बल्कि उन्हें भविष्य के लिए सख्त चेतावनी भी दी।
क्या है पूरा कानूनी विवाद ?
मामले के अनुसार, नगला इमली निवासी राम नरेश ने विजय, अजीत, मोहित, अजय बाबू और रोहित के विरुद्ध मारपीट और गाली-गलौज का मुकदमा दर्ज कराया था। आरोप था कि उधार के रुपयों के तगादे पर आरोपियों ने लाठी-डंडों से हमला किया।
चूंकि मुकदमे में दर्ज सभी धाराएं ‘जमानतीय’ (Bailable) थीं और सजा का प्रावधान 7 वर्ष से कम था, इसलिए नियमानुसार आरोपियों को अधीनस्थ न्यायालय (Lower Court) में नियमित जमानत के लिए आवेदन करना चाहिए था।
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लेकिन आरोपी अजय बाबू और रोहित ने गिरफ्तारी का काल्पनिक भय दिखाकर सीधे सत्र न्यायालय में अग्रिम जमानत की अर्जी लगा दी।
वादी के अधिवक्ता के तर्क और कोर्ट का रुख
सुनवाई के दौरान वादी के अधिवक्ता नरेंद्र सिंह ने आरोपियों की मंशा पर सवाल उठाए।
उन्होंने दलील दी कि:
* जब धाराएं पहले से ही जमानतीय हैं, तो गिरफ्तारी का कोई कानूनी आधार ही नहीं बनता।
* विवेचक (Investigator) द्वारा भी आरोपियों की गिरफ्तारी का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है।
* आरोपियों के पास निचली अदालत में हाजिर होकर नियमित जमानत लेने का स्पष्ट विकल्प मौजूद है।
न्यायालय का कड़ा आदेश:
एडीजे-25 माननीय मदन मोहन ने वादी के अधिवक्ता के तर्कों से सहमत होते हुए आरोपियों की अर्जी को आधारहीन माना।
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अदालत ने अपने आदेश में कहा:
“जमानतीय धाराओं में बिना अधीनस्थ न्यायालय जाए सीधे अग्रिम जमानत मांगना उचित नहीं है। आरोपियों को चेतावनी दी जाती है कि वे भविष्य में कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति सावधान रहें।”
कानूनी समझ (Key Takeaway):
अग्रिम जमानत आमतौर पर केवल ‘गैर-जमानतीय’ (Non-Bailable) अपराधों में गिरफ्तारी से बचने के लिए मांगी जाती है।
जमानतीय अपराधों में आरोपी को निचली अदालत से ही जमानत मिल जाती है, इसलिए उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय ऐसी अर्जियों को प्रक्रिया का उल्लंघन मानते हैं।
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