आगरा।
उत्तर प्रदेश की न्याय व्यवस्था और पुलिस कार्यप्रणाली की सुस्ती का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। आगरा कैंट स्टेशन से वर्ष 2002 में हुई एक ऑटो चोरी के मामले में, 23 साल लंबे इंतजार के बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) माननीय मृत्युंजय श्रीवास्तव ने आरोपी को साक्ष्य के अभाव में बरी करने के आदेश दिए हैं।
जानिए क्या था मामला ?
मामला 27 सितंबर 2002 की रात का है। थाना सदर में दर्ज मुकदमे के अनुसार, वादी का ऑटो चालक उस्मान आगरा कैंट स्टेशन पर ऑटो खड़ा कर चाय पीने गया था।
तभी कुछ अज्ञात लोग ऑटो चोरी कर ले जाने लगे। शोर मचाने पर वादी और चालक ने अन्य ऑटो से पीछा किया। सिंधी ट्रेवल्स के पास पेट्रोल खत्म होने पर ऑटो रुक गया, जहाँ से सलीमुद्दीन (निवासी नौलक्खा, सदर) और दो अन्य को पकड़कर पुलिस के हवाले किया गया था।
23 साल की लंबी प्रतीक्षा, पर गवाह शून्य
हैरानी की बात यह है कि इस पूरे मामले में पुलिस की पैरवी बेहद लचर रही।
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कोर्ट में सुनवाई के दौरान:
* वादी और चालक नदारद: न तो शिकायत करने वाला वादी और न ही मुख्य चश्मदीद चालक उस्मान कभी गवाही देने पहुंचे।
* पुलिस की लापरवाही: इस लंबी अवधि में थाना सदर से न तो कोई विवेचक (Investigator) आया और न ही कोई पुलिसकर्मी गवाही के लिए उपस्थित हुआ।
* आरोपी का संघर्ष: आरोपी सलीमुद्दीन पिछले 23 वर्षों से लगातार अदालत के चक्कर काटता रहा, जबकि पुलिस ने केवल उसके विरुद्ध ही आरोप पत्र पेश किया था।
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न्यायालय का कड़ा रुख:
आरोपी के अधिवक्ता संजय उपाध्याय ने अदालत में तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को बिना किसी ठोस सबूत और गवाही के इतने वर्षों तक मानसिक और न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। अदालत द्वारा बार-बार अवसर दिए जाने के बावजूद अभियोजन पक्ष कोई भी गवाह पेश करने में विफल रहा।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट माननीय मृत्युंजय श्रीवास्तव ने मामले की गंभीरता और साक्ष्यों के पूर्णतया अभाव को देखते हुए आरोपी सलीमुद्दीन को बाइज्जत बरी करने का आदेश जारी किया।
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