आगरा/प्रयागराज:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगरा से जुड़े धर्म परिवर्तन और अवैध कैद के एक मामले में महत्वपूर्ण और सख्त फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि धर्म और निजी पसंद के फैसले में माता-पिता ‘सुपर गार्जियन’ नहीं बन सकते हैं, क्योंकि हर बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से जिंदगी जीने का पूरा अधिकार है।
दो सगी बहनों द्वारा दाखिल की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस संदीप जैन की सिंगल बेंच ने पिता की हिरासत से दोनों बालिग बहनों को मुक्त करा दिया है। दोनों बहनों ने हिंदू धर्म से इस्लाम धर्म अपनाया था, जिसके बाद उन्हें जबरदस्ती अवैध कैद में रखा गया था।
अदालत ने मौलिक अधिकारों के गैर-कानूनी हनन को गंभीरता से लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और लड़कियों के पिता को संयुक्त रूप से बराबर राशि में कुल 25 लाख रुपए का मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

कोर्ट ने फैसले की तारीख से आठ हफ्ते के भीतर यह मुआवजा राशि देने का आदेश दिया है। इसके साथ ही, संबंधित अधिकारियों को 7 दिन के भीतर बहनों के पासपोर्ट, प्रमाण पत्र और अन्य जरूरी दस्तावेज लौटाने के निर्देश भी दिए गए हैं।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि मुआवजे की पूरी रकम चुकाने के बाद राज्य सरकार के पास यह अधिकार होगा कि वह मुआवजे का पचास प्रतिशत हिस्सा लड़कियों के पिता से और शेष पचास प्रतिशत हिस्सा उस दोषी सरकारी कर्मचारी से वसूल करे, जिसकी लापरवाही या कृत्यों के कारण पीड़ितों की आज़ादी का असंवैधानिक हनन हुआ था।
यह फैसला महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और उनके स्वतंत्र जीवन में किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप को रोकने के लिए एक कड़ा संदेश माना जा रहा है।
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