आगरा।
जहाँ एक ओर उत्तर प्रदेश पुलिस शासन के निर्देश पर अपराधियों को त्वरित सजा दिलाने के लिए ‘ऑपरेशन कनविक्शन’ (Operation Conviction) जैसे अभियान चला रही है, वहीं दूसरी ओर पुलिस की बेहद लापरवाह कार्यशैली का एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है।
सीजेएम माननीय मृत्युंजय श्रीवास्तव की अदालत ने आयुध अधिनियम के एक आरोपी सर्वेश को साक्ष्य के पूर्णतया अभाव में बरी करने का आदेश दिया, क्योंकि दस वर्ष के लंबे विचारण के दौरान पुलिस एक भी गवाह अदालत में पेश नहीं कर सकी।
क्या था मामला ?
* आरोपी: सर्वेश पुत्र शादी लाल, निवासी ग्राम कुँआ खेरा, थाना ताजगंज, आगरा।
* गिरफ्तारी: 26 जुलाई 2015 को थाना ताजगंज पुलिस द्वारा।
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* आरोप: एसआई मनोज कुमार शर्मा ने थाने पर मुकदमा दर्ज कराया था कि गश्त और चेकिंग के दौरान मुखबिर की सूचना पर पुलिस दल (जिसमें दर्शन सिंह और राहुल कुमार भी शामिल थे) ने गंदे नाले की पुलिया से आरोपी सर्वेश को गिरफ्तार किया था।
* बरामदगी: पुलिस ने आरोपी के कब्जे से 315 बोर का अवैध तमंचा और कारतूस बरामद करने का दावा किया था और उसे 25 आर्म्स एक्ट के तहत जेल भेजा गया था।
न्यायालय में पुलिस की ‘लापरवाही की हद’
मामले का विचारण दस वर्ष तक चला। इस दौरान आरोपी सर्वेश अपने वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेंद्र कुमार गुप्ता और ज्योति शाक्य के साथ हर तारीख पर अदालत में हाजिर होता रहा।
* कोर्ट का सख्त रुख: अदालत द्वारा कई बार आदेश पारित किए जाने के बावजूद भी, अभियोजन पक्ष एक भी पुलिस गवाह को अदालत में हाजिर नहीं करा सका।
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* लगातार तारीख पर तारीख पड़ने से आजिज आए आरोपी और उनके अधिवक्ता वीरेंद्र कुमार गुप्ता के आग्रह पर, सीजेएम माननीय मृत्युंजय श्रीवास्तव ने पुलिस की इस हद दर्जे की लापरवाही को देखते हुए अभियोजन पक्ष को गवाही का अवसर समाप्त कर दिया।
साक्ष्य के पूर्णतया अभाव और अभियोजन पक्ष की विफलता के कारण, अदालत ने आरोपी सर्वेश को तत्काल बरी करने का आदेश दिया।
पुलिस की यह कार्यशैली न केवल न्याय प्रक्रिया में विलंब का कारण बनी, बल्कि शासन के ‘ऑपरेशन कनविक्शन’ की मंशा का भी मज़ाक उड़ाती दिखी।
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