आगरा उपभोक्ता फोरम प्रथम का बड़ा फैसला: संक्रमित रक्त चढ़ाने से हुई मौत के मामले में 21 साल बाद मिला न्याय

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आगरा।

जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग प्रथम, आगरा ने चिकित्सा लापरवाही के एक गंभीर और पुराने मामले में पीड़ित पक्ष को मुआवजा दिलाते हुए निष्पादन वाद का निस्तारण कर दिया है।

12 सितंबर 2026 को लगी राष्ट्रीय लोक अदालत में निर्णीत ऋणी (विपक्षी) द्वारा 4,10,100/- रुपये (चार लाख दस हजार एक सौ रुपये) की धनराशि आयोग के खाते में जमा कर दी गई है। आयोग ने यह राशि परिवादी रफीक खान को अकाउंटपेयी चेक के माध्यम से प्रदान कर दी है ।

मामले की पृष्ठभूमि यह मामला मूल रूप से साल 2005 का है। धौलपुर, राजस्थान निवासी रफीक खान ने अपनी पत्नी रानी को प्रसूति के लिए 26 मई 2005 को आगरा के एस.एन. मेडिकल कॉलेज में डॉ. अरुण नागरथ के अधीन भर्ती कराया था।

शिकायत के अनुसार, डॉ. नागरथ के कहने पर समर्पण ब्लड बैंक से ‘ओ निगेटिव’ रक्त खरीदकर लाया गया और बिना उचित जांच के रानी को चढ़ा दिया गया।

यह रक्त संक्रमित था, जिसके कारण रानी को रक्त संक्रमण (सेप्टिसीमिया) हो गया और उनकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया। हालात लगातार बिगड़ने पर उन्हें दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान 13 जून 2005 को उनकी मृत्यु हो गई।

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2014 में आया था मूल फैसला :

इस मामले में परिवाद संख्या 412/2005 पर सुनवाई करते हुए 15 मई 2014 को तत्कालीन फोरम अध्यक्ष श्याम बिहारी शर्मा ने अहम फैसला सुनाया था।

फोरम ने माना था कि चिकित्सक ने फीस लेकर इलाज किया था, इसलिए यह निःशुल्क सेवा नहीं है और वे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दायरे में आते हैं।

फैसले में डॉ. अरुण नागरथ और समर्पण ब्लड बैंक दोनों को सेवा में कमी और घोर लापरवाही का दोषी पाया गया था।

फोरम ने दोनों विपक्षियों को 5,02,000/- रुपये (पांच लाख दो हजार) की क्षतिपूर्ति धनराशि 7 प्रतिशत ब्याज के साथ परिवादी को अदा करने का आदेश दिया था।

लोक अदालत में हुआ अंतिम निष्पादन:

उपभोक्ता फोरम के इस आदेश के अनुपालन के लिए निष्पादन वाद संख्या 24/2026 दायर किया गया था। 12 सितंबर 2026 को राष्ट्रीय लोक अदालत में आयोग के अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह के समक्ष यह पत्रावली पेश हुई।

डॉ. अरुण नागरथ (मृतक) के वारिसान और अन्य विपक्षियों की ओर से वांछित धनराशि 4,10,100/- रुपये जमा करा दिए जाने के बाद, आयोग ने निष्पादन वाद प्रार्थना पत्र स्वीकार कर लिया।

आयोग ने डिक्रीदार को यह राशि प्राप्त करने का अधिकारी बताते हुए निष्पादन वाद की कार्यवाही को समाप्त कर दिया है।

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विवेक कुमार जैन
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