आगरा/नई दिल्ली:
केंद्र सरकार द्वारा 5 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शुरू की गई ‘सड़क दुर्घटना पीड़ितों का नकदी रहित उपचार योजना 2025’ पाँच महीने बाद भी कागजों तक ही सीमित है।
यह बात अधिवक्ता के.सी. जैन को सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय से प्राप्त हुई सूचना से सामने आई है। चौंकाने वाली बात यह है कि सरकार के पास इस योजना के लाभार्थियों का कोई मासिक आंकड़ा भी नहीं है, जबकि इलाज का सारा खर्च केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए एक फंड से ही किया जाना है।
सरकार के पास नहीं हैं आँकड़े, सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी:
यह योजना सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता के.सी. जैन द्वारा दायर याचिका के बाद अस्तित्व में आई थी। योजना को तत्काल राहत देने के लिए बनाया गया था, लेकिन लगभग पाँच महीने बीत जाने के बाद भी न तो अस्पताल इसके लिए तैयार हैं, न ही कोई प्रभावी तंत्र (system) बन पाया है।
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केंद्र सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि उनके पास इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि योजना शुरू होने के बाद से हर महीने कितने सड़क दुर्घटना पीड़ितों को इसका लाभ मिला है।
अधिवक्ता जैन ने बताया कि सरकार ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में जो शपथपत्र दाखिल किया है, उसमें भी लाभार्थियों की संख्या या योजना के प्रचार-प्रसार के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस योजना का व्यापक प्रचार करने का निर्देश दिया था, लेकिन आम जनता को अभी भी इसकी कोई जानकारी नहीं है।
₹1.5 लाख और 7 दिन की सीमा अपर्याप्त:
योजना के तहत सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति का इलाज 7 दिन तक या ₹1.5 लाख तक की सीमा में किया जाता है। हालांकि, यह सीमा गंभीर चोटों, बड़े ऑपरेशन, आईसीयू देखभाल और लंबे इलाज के लिए अपर्याप्त साबित होती है। इस वजह से कई पीड़ित परिवार इलाज का खर्च उठाने के लिए कर्ज में डूब जाते हैं।
इस समस्या को हल करने के लिए, अधिवक्ता जैन ने सुप्रीम कोर्ट में एक और याचिका दायर की है। इस याचिका में मोटर वाहन अधिनियम की धारा 162(1) के तहत बीमा कंपनियों से दुर्घटना पीड़ितों के इलाज का खर्च (अस्पताल में भर्ती होने से पहले, दौरान और बाद में) पूरी तरह से नकदी रहित करने की मांग की गई है।

उनका मानना है कि इससे पीड़ितों को इलाज में होने वाली मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ेगा और इलाज के खर्च की भरपाई के लिए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल में सालों तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
“कोई घायल सड़क पर तड़पकर न मरे, यही मेरी लड़ाई”:
अधिवक्ता के.सी. जैन ने कहा,
“मैंने कैशलेस इलाज की याचिका इसलिए दायर की थी ताकि कोई भी घायल व्यक्ति सड़क पर तड़पकर न मरे और हर परिवार को बिना सोचे-समझे इलाज मिल सके।”
उन्होंने कहा कि पाँच महीने बाद भी जब यह योजना जमीन पर नहीं उतर पाई है, तो केंद्र सरकार को इस संबंध में राज्यों के साथ मिलकर काम करना चाहिए, ताकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन हो सके।
उनका कहना है कि
“कोई भी माँ, कोई भी पत्नी, या कोई भी बच्चा अपने प्रियजन को इलाज के अभाव में खोने के लिए मजबूर न हो।”
इस स्थिति को देखते हुए, यह साफ है कि एक महत्वपूर्ण योजना, जो जान बचाने के लिए बनाई गई थी, नौकरशाही और कार्यान्वयन की कमी के कारण अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पा रही है।
जब तक सरकार और संबंधित एजेंसियां इस पर गंभीरता से काम नहीं करतीं, तब तक सड़क दुर्घटना पीड़ितों की मुश्किलें कम होने के बजाय बढ़ती ही जाएंगी।
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