बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की पोषणीयता पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में बहस, कोर्ट ने जवाब दाखिल करने के लिए दिया चार सप्ताह का समय

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आगरा /प्रयागराज ।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में आशुतोष पांडेय और एक अन्य व्यक्ति की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई हुई।

यह मामला भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 170, 126 और 135 के तहत शुरू की गई कार्यवाही से जुड़ा है।

जस्टिस अजय भनोट और जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की खंडपीठ के समक्ष हुई इस सुनवाई में याचिका की पोषणीयता को लेकर दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस देखने को मिली।

याचिका की पोषणीयता पर दोनों पक्षों के तर्क:

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल एडवोकेट जनरल अनूप त्रिवेदी ने याचिका का कड़ा विरोध किया।

उन्होंने दलील दी कि यह बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका कानूनन सुनवाई योग्य नहीं है। राज्य पक्ष ने अदालत को सूचित किया कि संबंधित व्यक्ति को बॉन्ड जमा न करने के कारण दस दिनों तक हिरासत में रखा गया था, लेकिन अब बॉन्ड जमा होने के बाद उनकी रिहाई का आदेश पहले ही जारी किया जा चुका है।

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इसके विपरीत, याचिकाकर्ता पक्ष के अधिवक्ता धीरज कुमार पांडेय ने सरकार की दलीलों का विरोध करते हुए अदालत के सामने यह बात रखी कि यह याचिका पूरी तरह से सुनवाई योग्य है और इस पर विचार किया जाना चाहिए।

कोर्ट का रुख और आगामी कार्यवाही:

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, याचिकाकर्ता पक्ष ने मामले में अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए अदालत से अतिरिक्त समय की मांग की।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के अनुरोध को स्वीकार करते हुए हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय प्रदान किया है।

इसके साथ ही अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को अपने-अपने हलफनामों का आपस में आदान-प्रदान करने का निर्देश दिया है।

इस मामले की अगली सुनवाई अब चार सप्ताह के बाद दोबारा होगी।

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मनीष वर्मा
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