आगरा।
विशेष न्यायाधीश (SC/ST एक्ट) माननीय शिव कुमार ने दुराचार, धमकी और दलित उत्पीड़न के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी दीपू उर्फ दीपचंद को सभी आरोपों से बरी कर दिया है।
अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों और पीड़िता के बयानों में समय और घटनाक्रम को लेकर ऐसे गंभीर विरोधाभास हैं, जिनसे पूरी कहानी संदिग्ध हो जाती है।
क्या था मामला ?
मामला आगरा के थाना मलपुरा क्षेत्र का है। वादिनी (पीड़िता की सास) ने आरोप लगाया था कि 20 अक्टूबर 2020 को जब वह सुबह 11 बजे धौलपुर से लौटी, तो उसने आरोपी दीपू को अपने घर से भागते हुए देखा।
बहू से पूछने पर पता चला कि आरोपी ने डरा-धमकाकर उसके साथ गलत काम (दुराचार) किया है। पुलिस ने तहरीर के आधार पर पॉक्सो एक्ट, दुराचार और दलित उत्पीड़न की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था।
बरी करने के मुख्य कानूनी आधार:
अदालत ने आरोपी के वरिष्ठ अधिवक्ता देवी राम शर्मा के तर्कों और गवाहों के बयानों का विश्लेषण करने के बाद निम्नलिखित बिंदुओं पर आरोपी को बरी किया:

* समय का बड़ा अंतर: पीड़िता का बयान: पीड़िता ने अदालत में गवाही देते हुए घटना का समय रात्रि 12 बजे बताया।
* परिवार के बयान: इसके विपरीत, पीड़िता की सास (वादिनी), पति और जेठ ने घटना दिन के 11 बजे होना बताया।
* साक्ष्यों का अभाव: पीड़िता की सास, पति और जेठ ने जिरह के दौरान यह स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी आँखों से घटना होते हुए नहीं देखी।
* मेडिकल रिपोर्ट में पुष्टि नहीं: डॉ. ममता किरन ने अपने बयानों में दुराचार के संबंध में कोई निश्चित राय नहीं दी। मेडिकल साक्ष्य से भी जबरन शारीरिक संबंध की पुष्टि नहीं हुई।
* विरोधाभासी गवाही: अदालत ने माना कि जब घटना के समय को लेकर ही पीड़िता और उसके परिवार के बयानों में जमीन-आसमान का अंतर है, तो अभियोजन की कहानी पर विश्वास नहीं किया जा सकता।
अदालत का निष्कर्ष:
विशेष न्यायाधीश ने फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा है। बयानों में विसंगति और पुख्ता साक्ष्यों की कमी के कारण आरोपी दीपू उर्फ दीपचंद को दोषमुक्त कर रिहा करने का आदेश दिया गया।
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