42 साल बाद मिला न्याय: पत्नी की हत्या के आरोपी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किया बरी, पुलिस के सामने कबूलनामा साक्ष्य नहीं

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आगरा/प्रयागराज।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चार दशक पुराने हत्या के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए आरोपी पति को आजीवन कारावास की सजा से मुक्त कर दिया है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस के समक्ष दिया गया इकबालिया बयान (Confession) कानूनन साक्ष्य के रूप में मान्य नहीं है और केवल इसी आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

निचली अदालत ने सुनाई थी उम्रकैद:

मामला मथुरा जिले के थाना राया का है। 2 फरवरी 1983 की रात राधा चरण शर्मा की पत्नी प्रमिला की हत्या हुई थी। आरोपी ने स्वयं थाने जाकर लिखित सूचना दी थी कि विवाद के बाद उसने पत्नी की फरसे से गर्दन काट दी है।

मथुरा की सत्र अदालत ने इसी स्वीकारोक्ति को आधार मानकर 19 जनवरी 1984 को उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणियां:

न्यायूमूर्ति राजीव गुप्ता एवं न्यायमूर्ति देवेन्द्र सिंह-प्रथम की खंडपीठ ने अपील पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत के फैसले में गंभीर कानूनी खामियां पाईं:

* साक्ष्य अधिनियम की धारा 25: कोर्ट ने कहा कि पुलिस की कस्टडी या उनके समक्ष किया गया कबूलनामा सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं है। ट्रायल कोर्ट ने इसे आधार बनाकर विधिक चूक की है।

* सबूत का भार (धारा 106): अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक अभियोजन पक्ष आरोपी की घर में मौजूदगी को ठोस रूप से साबित नहीं कर देता, तब तक साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के तहत सबूत पेश करने का भार आरोपी पर नहीं डाला जा सकता।

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* संदिग्ध बरामदगी और मेडिकल रिपोर्ट: जिस फरसे को हत्या का हथियार बताया गया, उसकी बरामदगी के गवाह मुकर चुके थे। साथ ही, डॉक्टर की रिपोर्ट के अनुसार बरामद फरसा इतना धारदार नहीं था कि उससे मृतका के शरीर पर मिले गहरे घाव किए जा सकें।

संदेह का लाभ और रिहाई:

हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों की कड़ी (Chain of circumstances) जोड़ने में पूरी तरह विफल रहा। घर के अन्य सदस्यों को गवाह के तौर पर पेश न करना भी मामले को संदेहास्पद बनाता है।

अदालत ने ‘संदेह का लाभ’ (Benefit of Doubt) देते हुए राधा चरण शर्मा को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।

केस फाइल:

* अदालत: इलाहाबाद हाईकोर्ट (खंडपीठ)

* आरोपी: राधा चरण शर्मा (मथुरा)

* कानूनी बिंदु: साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 और 106।

* निर्णय: 1984 में मिली उम्रकैद की सजा रद्द, आरोपी दोषमुक्त।

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मनीष वर्मा
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