इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला: बालिग को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का संवैधानिक अधिकार

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आगरा/प्रयागराज ।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अंतरधार्मिक विवाह के एक मामले में महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और अपनी इच्छा से जीवन जीने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है।

न्यायालय ने टिप्पणी की है कि किसी बालिग के इस व्यक्तिगत निर्णय में माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्य अपनी इच्छा नहीं थोप सकते, क्योंकि यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता और निजता के अधिकार से जुड़ा मामला है।

यह आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस संदीप जैन की एकल पीठ ने गाजियाबाद की एक युवती की ओर से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।

अदालत के निर्देश पर इंदिरापुरम थाना पुलिस ने युवती को न्यायालय के समक्ष पेश किया था, जहां कोर्ट ने युवती, उसके पति और उसके पिता का पक्ष व्यक्तिगत रूप से सुना।

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, 26 वर्षीय स्नातक युवती ने अदालत को बताया कि उसने 28 अगस्त 2022 को एक मुस्लिम युवक से अपनी मर्जी और बिना किसी दबाव के विवाह किया था।

युवती का आरोप था कि अपनी पसंद से शादी करने के कारण उसके पिता लगातार उस पर दबाव बना रहे हैं और उसे डराया-धमकाया जा रहा है। युवती ने न्यायालय के समक्ष स्पष्ट रूप से अपने पति के साथ रहने की इच्छा जताई।

वहीं, सुनवाई के दौरान युवती के पिता ने अदालत में दलील दी कि उनकी बेटी पर युवक का अनुचित प्रभाव है और उसे ब्लैकमेल किया जा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने अंतरधार्मिक होने के आधार पर इस विवाह की कानूनी वैधता पर भी सवाल खड़े किए।

न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और युवती से सीधे संवाद करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि युवती पूरी तरह बालिग है और अपने फैसलों व उनके परिणामों को समझने में बौद्धिक रूप से सक्षम है।

अदालत को ऐसा कोई भी विधिक या तथ्यात्मक आधार नहीं मिला जो यह साबित कर सके कि युवती किसी अनुचित दबाव या प्रभाव में अपना निर्णय ले रही है।

इसके पश्चात कोर्ट ने युवती को उसकी इच्छानुसार अपने पति के साथ रहने की अनुमति प्रदान कर दी।

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मनीष वर्मा
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