वाह री, पुलिस 13 वर्ष में एक भी गवाह नहीं किया पेश

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अपील सत्र न्यायालय ने भी अभियोजन की लापरवाही पर निचली अदालत का आदेश रखा यथावत ,बच्चे के अपहरण की आरोपी महिला को किया बरी

आगरा।

पुलिस और अभियोजन पक्ष की घोर लापरवाही के कारण तेरह वर्षों तक चले अपहरण के एक मामले में अंततः आरोपी महिला को सत्र न्यायालय से भी राहत मिल गई है।

अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (संख्या-21) माननीय विराट कृष्ण श्रीवास्तव ने अधीनस्थ न्यायालय द्वारा आरोपी को दोषमुक्त करने के निर्णय को सही ठहराते हुए अभियोजन पक्ष की अपील को खारिज कर दिया है।

अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि मामले में साक्ष्य प्रस्तुत न कर पाने की पूरी जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की है।

यह विवाद वर्ष 2011 का है, जब थाना ताजगंज क्षेत्र के निवासी शंकरिया का ढाई वर्षीय पुत्र घर के बाहर खेलते समय संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गया था।

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वादी द्वारा क्षेत्र में सार्वजनिक उद्घोषणा कराने के बाद पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया था। तत्कालीन पुलिस जांच में यह दावा किया गया था कि श्रीमती शकुंतला पत्नी स्व. पन्ना लाल के पास से बच्चे को बरामद कर उन्हें जेल भेजा गया था।

हैरानी की बात यह रही कि निचली अदालत में इस मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस तेरह वर्षों में एक भी गवाह पेश करने में विफल रही।

वादी मुकदमा सहित अन्य महत्वपूर्ण गवाहों की सूची होने के बावजूद अदालत के समक्ष कोई बयान दर्ज नहीं कराया जा सका।

साक्ष्यों की इसी कमी के आधार पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने 28 अक्टूबर 2024 को श्रीमती शकुंतला को दोषमुक्त करने का आदेश दिया था।

दोषमुक्ति के इस आदेश के विरुद्ध अभियोजन पक्ष ने आनन-फानन में सत्र न्यायालय का रुख किया।

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अपील पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं धर्मेंद्र त्यागी और अनिल कुमार ने तर्क दिया कि जब एक दशक से अधिक समय मिलने पर भी अभियोजन कोई ठोस साक्ष्य नहीं दे सका, तो अपील का कोई आधार नहीं रह जाता है।

न्यायाधीश माननीय विराट कृष्ण श्रीवास्तव ने बचाव पक्ष के तर्कों से सहमत होते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष अपनी विफलता का दोष किसी और पर नहीं मढ़ सकता।

न्यायालय ने अधीनस्थ अदालत के फैसले को यथावत रखते हुए अपील को गुणवत्ता विहीन मानकर निरस्त कर दिया है।

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विवेक कुमार जैन
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