आगरा/नई दिल्ली
नई दिल्ली स्थित साकेत कोर्ट ने चेक बाउंस के एक पुराने मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए आरोपी को कारावास और भारी जुर्माने की सजा सुनाई है।
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी माननीय श्रुति शर्मा की अदालत ने श्यामोल बिजोली बनाम मीना कश्यप के मामले में यह फैसला सुनाया है।
मामले की पृष्ठभूमि और अदालती कार्यवाही:
यह कानूनी विवाद एक संपत्ति सौदे से जुड़ा था। शिकायतकर्ता श्यामोल बिजोली के अनुसार, आरोपी मीना कश्यप ने दक्षिण पुरी स्थित अपनी एक संपत्ति 9,00,000/- रुपये में बेचने का समझौता किया था और अग्रिम राशि के रूप में 2,80,000/- रुपये प्राप्त किए थे।
जब यह सौदा विफल हो गया, तो आरोपी ने इस राशि की वापसी के लिए अक्टूबर 2019 में एक चेक जारी किया। शिकायतकर्ता ने जब इस चेक को बैंक में जमा किया, तो यह खाते में अपर्याप्त धनराशि होने के कारण अनादरित हो गया।
कानूनी नोटिस भेजने के बावजूद भुगतान न होने पर शिकायतकर्ता ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत आपराधिक शिकायत दर्ज कराई।
अदालत ने अपने विश्लेषण में पाया कि आरोपी चेक पर अपने हस्ताक्षरों से इंकार नहीं कर सकी और वह चेक के दुरुपयोग से संबंधित कोई ठोस साक्ष्य भी पेश करने में विफल रही।
सजा का निर्धारण:
अदालत ने दोषी मीना कश्यप को निम्नलिखित सजा सुनाई है:
* दोषी को छह महीने के साधारण कारावास की सजा दी गई है।

* आरोपी पर चेक की कुल राशि का दोगुना जुर्माना लगाया गया है, जिसे शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में दिया जाएगा।
* मुआवजे की यह राशि आदेश के 60 दिनों के भीतर चुकानी होगी।
* यदि दोषी जुर्माना भरने में विफल रहती है, तो उसे छह महीने की अतिरिक्त साधारण कैद भुगतनी होगी।
* सुनवाई के दौरान यदि मध्यस्थता के माध्यम से कोई भुगतान किया गया है, तो उसे मुआवजे की राशि में समायोजित किया जाएगा।
सजा का निलंबन और जमानत:
सजा सुनाए जाने के बाद, दोषी के वकील ने ऊपरी अदालत में अपील दायर करने के लिए सजा को स्थगित करने और जमानत देने का आवेदन किया।
अदालत ने इस आवेदन पर विचार करते हुए निर्देश दिया कि चूंकि अपराध जमानती है और दोषी सुनवाई के दौरान भी जमानत पर थी, इसलिए उनकी सजा को अपील दायर करने के उद्देश्य से निलंबित किया जाता है।
अदालत ने मीना कश्यप को 10,000/- रुपये के जमानत बॉन्ड पर 30 दिनों के लिए रिहा करने का आदेश दिया है।
साथ ही, अदालत ने स्पष्ट किया कि अपील दायर करने के लिए दोषी को सजा के आदेश की प्रति निःशुल्क प्रदान की गई है।
कानूनी प्रतिनिधित्व:
इस मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों के विद्वान अधिवक्ताओं ने अपने-अपने पक्ष रखे।
मामले में शिकायतकर्ता की ओर से विद्वान अधिवक्ता के के शर्मा द्वारा प्रभावी रूप से अंतिम बहस प्रस्तुत की गई, जबकि आरोपी के अधिवक्ता ने साक्ष्यों की विश्वसनीयता और दस्तावेजों की सत्यता पर सवाल उठाए थे।
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