आगरा।
जनपद की एक अदालत ने पुलिस की घोर लापरवाही और साक्ष्यों में भारी विरोधाभास के चलते हत्या के प्रयास एवं आयुध अधिनियम के पांच आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया है।
एडीजे माननीय मृदुल दुबे की अदालत ने पुलिस द्वारा दर्शायी गई हथियारों की बरामदगी को पूर्णतया फर्जी और संदिग्ध मानते हुए आरोपियों को संदेह का लाभ दिया है।
मामला थाना एत्माउद्दौला से जुड़ा है, जहां श्रीमती सरताज नामक महिला ने तहरीर दी थी कि 1 अप्रैल 2022 को आरोपी देव उर्फ नेहरू ने उनके घर में घुसकर उनकी पुत्री हुमा के साथ मारपीट की और उस पर जानलेवा हमला करते हुए पेट में गोली मार दी।
पुलिस ने इस मामले में देव उर्फ नेहरू, अमित सविता, अरविंद बघेल, सूरज बघेल और रघु ठाकुर के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में प्रेषित किया था।
न्यायालय ने सुनवाई के दौरान पाया कि पुलिस की जांच और बरामदगी की प्रक्रिया में जमीन-आसमान का अंतर था। पुलिस ने अपनी फर्द बरामदगी की रिपोर्ट में मुख्य आरोपी देव के पास से 9 एमएम की पिस्टल बरामद होना दिखाया था, जबकि विधि विज्ञान प्रयोगशाला में जांच के लिए 32 बोर की पिस्टल भेजी गई।
हद तो तब हो गई जब अदालत के समक्ष सीलबंद पुलिंदा खोला गया, तो उसमें से 7.65 एमएम की देशी पिस्टल निकली।
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लापरवाही का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। दूसरे आरोपी अमित सविता से बरामद बताए गए 315 बोर के तमंचे को पुलिस ने जांच के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजा ही नहीं।
इसके अतिरिक्त, पुलिस पूरी कार्यवाही में बरामदगी का कोई भी स्वतंत्र गवाह अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने में विफल रही।
बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि पुलिस ने मामले में फर्जी बरामदगी दिखाई है और साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की गई है।
अदालत ने पत्रावली के अवलोकन और अधिवक्ताओं के तर्कों से सहमत होते हुए माना कि पुलिस की बरामदगी की थ्योरी पूरी तरह संदिग्ध है।
साक्ष्यों के इसी अभाव में न्यायालय ने पांचों आरोपियों को दोषमुक्त करने का आदेश जारी किया।
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