आगरा।
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, प्रथम, आगरा ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पॉलिसीधारक द्वारा बीमा लेते समय अपनी पूर्व बीमारी और शराब के सेवन जैसी महत्वपूर्ण जानकारी को छिपाया जाता है, तो ऐसी स्थिति में बीमा कंपनी द्वारा क्लेम खारिज किया जाना सेवा में कोई कमी नहीं माना जाएगा।
इस टिप्पणी के साथ आयोग के अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह की पीठ ने मृतक पॉलिसीधारक की पत्नी द्वारा दायर 15.53 लाख रुपये के क्षतिपूर्ति क्लेम परिवाद को खारिज कर दिया।
मामले के अनुसार, न्यू आगरा निवासिनी मनीषा तोमर ने टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के विरुद्ध परिवाद दाखिल किया था।
परिवादिनी का कहना था कि उनके दिवंगत पति सुरीत सोलंकी फ्यूचर ग्रुप में कार्यरत थे और उन्होंने केनरा बैंक के जरिए 24 जुलाई 2022 को 5 लाख रुपये की सम इंश्योर्ड वाली ग्रुप मेडिकेयर पॉलिसी ली थी।
इसके उपरांत 26 फरवरी 2023 को अतिरिक्त प्रीमियम का भुगतान कर 25 लाख रुपये की टॉप-अप पॉलिसी भी प्राप्त की गई थी। पॉलिसीधारक को पेट दर्द की शिकायत के बाद सिनर्जी अस्पताल आगरा और बाद में आईएलबीएस नई दिल्ली में भर्ती कराया गया, जहां 25 अप्रैल 2023 को इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

उपचार में कुल 15,53,400/- रुपये का व्यय हुआ था। बीमा कंपनी ने पूर्व बीमारी छिपाने का हवाला देकर क्लेम निरस्त कर दिया, जिसके खिलाफ परिवादिनी ने आयोग का दरवाजा खटखटाया था।
वहीं बीमा कंपनी की ओर से अधिवक्ता ने तर्क दिया कि पॉलिसीधारक क्रोनिक अल्कोहल और क्रोनिक लिवर डिजीज से पीड़ित थे।
उन्होंने पॉलिसी लेते समय और टॉप-अप कराते समय इस गंभीर तथ्य को जानबूझकर छिपाया। कंपनी ने कहा कि अस्पताल के अभिलेखों के अनुसार मरीज की मृत्यु क्रोनिक लिवर फेल्योर के कारण हुई, जो पॉलिसी के अनुबंध व सामान्य अपवर्जन की शर्तों के तहत आती है, इसलिए क्लेम नियमानुसार खारिज किया गया।
आयोग ने पत्रावली और चिकित्सा अभिलेखों का परिशीलन करने के बाद पाया कि पॉलिसीधारक पॉलिसी लेने से पूर्व ही गंभीर लिवर रोग से ग्रस्त थे और उनका शराब के सेवन का इतिहास था।
आयोग ने कहा कि बीमा अनुबंध पूर्ण सद्भाव के सिद्धांत पर आधारित होता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित विधि सिद्धांतों का हवाला देते हुए उपभोक्ता आयोग ने व्यवस्था दी कि यदि पॉलिसीधारक द्वारा प्रस्ताव पत्र में महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा नहीं किया जाता है, तो बीमा कंपनी अनुबंध की शर्तों के अंतर्गत दावा निरस्त करने का विधिक अधिकार रखती है।
आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी ने क्लेम निरस्त करके सेवा में कोई कमी नहीं की है, अतः परिवाद निरस्त किए जाने योग्य है।
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