आगरा।
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आगरा कैनाल की सिकंदरा राजवाह, मघटई माइनर तथा सिकंदरा राजवाह व टर्मिनल राजवाह के संरक्षित वन की पुनर्स्थापना एवं संरक्षण से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार सहित संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
अजय प्रताप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य आदि की ओर से दायर इस याचिका की सुनवाई एनजीटी के चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव एवं विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद की पीठ में हुई।
पीठ ने मामले पर संज्ञान लेते हुए सभी विपक्षी पक्षों को नोटिस जारी कर अगली सुनवाई की तिथि चार जनवरी निर्धारित की है।
सुनवाई के दौरान वादी अधिवक्ता अजय प्रताप सिंह ने ट्रिब्यूनल के समक्ष तर्क रखा कि अनियंत्रित शहरीकरण ने ऐतिहासिक सिकंदरा राजवाह और उसके संरक्षित वन क्षेत्र को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।
उन्होंने वर्ष 1905 और 1965 के आगरा गजेटियर का संदर्भ देते हुए बताया कि सिकंदरा साइट सी पर ग्राम लखनपुर में राजवाह को नष्ट कर सड़क का निर्माण कर दिया गया है।


इसके अलावा साइट सी से भगवान टॉकीज तक के हिस्से में संरक्षित वन क्षेत्र को नष्ट कर व्यापक अतिक्रमण कर लिया गया है।
वर्तमान में यह राजवाह भगवान टॉकीज से सुल्तानगंज की पुलिया और लंगड़े की चौकी से होते हुए वाटर वर्क्स के पीछे यमुना नदी में गंदे नाले के रूप में गिर रहा है।
अधिवक्ता ने यह भी आरोप लगाया कि रोहता नहर के नाम से पहचानी जाने वाली टर्मिनल राजवाह के संरक्षित वन क्षेत्र में भी सड़क निर्माण कार्य किया जा रहा है।
अपने दावों की पुष्टि के लिए वादी की ओर से कई आधिकारिक दस्तावेज, जीपीएस युक्त तस्वीरें और सैटेलाइट चित्र साक्ष्य के रूप में पीठ के समक्ष प्रस्तुत किए गए।
इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव (पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन), प्रमुख मुख्य वन संरक्षक, प्रमुख सचिव (सिंचाई), प्रमुख सचिव (नगर विकास), प्रमुख सचिव (ग्रामीण विकास), जिलाधिकारी आगरा, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन व क्षेत्रीय अधिकारी, नगर आयुक्त आगरा नगर निगम, उपाध्यक्ष आगरा विकास प्राधिकरण और ताज ट्रिपेजियम जोन के अध्यक्ष को पक्षकार बनाया गया है।
ट्रिब्यूनल ने इन सभी अधिकारियों से मामले में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।
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