आगरा/प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी ही दादी की हत्या के आरोपी योगेंद्र यादव (कुशीनगर) को राहत प्रदान करते हुए सशर्त जमानत मंजूर कर ली है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत को सजा के तौर पर नहीं रोका जा सकता।
यह आदेश न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की पीठ ने आरोपी की जमानत याचिका पर बचाव पक्ष और सरकारी अधिवक्ता के तर्कों को सुनने के बाद दिया।
मामले का विवरण:
* घटना: 31 अक्टूबर 2025 को कुशीनगर के जठान बाजार थाना क्षेत्र में हत्या की वारदात हुई थी।
* दर्ज केस: आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(1) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
* हिरासत: आरोपी 2 नवंबर 2025 से लगातार जेल में बंद था।
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बचाव पक्ष की दलीलें:
सुनवाई के दौरान आरोपी के अधिवक्ता ने पुलिस की कहानी पर सवाल उठाते हुए निम्नलिखित बिंदु रखे:
* प्रक्रियात्मक देरी: एफआईआर दर्ज करने में अनावश्यक देरी की गई।
* विरोधाभास: पंचनामा और पोस्टमार्टम की प्रक्रिया एफआईआर दर्ज होने से पहले ही पूरी कर ली गई, जो संदेह पैदा करती है।
* साक्ष्यों का अभाव: मामले में कोई भी प्रत्यक्षदर्शी (Eye Witness) नहीं है।
* साफ छवि: आरोपी का कोई पिछला आपराधिक इतिहास नहीं है।
न्यायालय की टिप्पणी और निर्णय:
अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के लैंडमार्क फैसलों ‘सतेंद्र कुमार अंतिल’ और ‘मनीष सिसोदिया’ मामलों का हवाला देते हुए कहा कि:
“जमानत एक नियम है और जेल अपवाद। किसी भी आरोपी को केवल सुनवाई के दौरान सजा के तौर पर जेल में नहीं रखा जा सकता।”
कोर्ट ने आरोपी को इस शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया कि वह साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा और मुकदमे की सुनवाई में पूरा सहयोग करेगा। शर्तों का उल्लंघन होने पर जमानत रद्द की जा सकती है।
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