आगरा/नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम.एम. सुंदरेश ने 2016 के गढ़चिरौली आगजनी मामले में दलित अधिकार कार्यकर्ता और वकील सुरेंद्र गाडलिंग की ज़मानत याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया है।
इस मामले की सुनवाई आज जस्टिस सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ के समक्ष होनी थी।
यह याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई है, जिसमें गढ़चिरौली जिले में हुई आगजनी की घटना के संबंध में गाडलिंग को ज़मानत देने से इंकार कर दिया गया था।

क्या है पूरा मामला ?
दिसंबर 2016 में, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में माओवादियों ने सुरजागढ़ खदानों से लौह अयस्क ले जा रहे 80 से अधिक वाहनों को कथित तौर पर आग लगा दी थी। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि गाडलिंग ने इस घटना में शामिल अन्य आरोपियों को निर्देश दिए थे।
गाडलिंग पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी ), भारतीय शस्त्र अधिनियम, महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए ) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज की थी ज़मानत:
नागपुर पीठ ने गाडलिंग की ज़मानत याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि जांच के दौरान जब्त किए गए पत्रों और हार्ड ड्राइव से पता चलता है कि वह आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने की साजिश का हिस्सा थे। कोर्ट ने यह भी पाया कि गाडलिंग न केवल प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के सदस्यों के वकील थे, बल्कि स्वयं भी उस संगठन के सदस्य थे।

भीमा कोरेगांव मामले में भी लंबित है याचिका:
सुरेंद्र गाडलिंग जून 2018 से तलोजा जेल में बंद हैं, जब उन्हें भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ्तार किया गया था। फरवरी 2019 में उन्हें गढ़चिरौली आगजनी मामले में भी गिरफ्तार किया गया।
भीमा कोरेगांव मामले में उनकी ज़मानत याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इस मामले में उनकी और सह-आरोपी महेश राउत की डिफ़ॉल्ट ज़मानत याचिकाओं को खारिज कर दिया था। उस फैसले के खिलाफ गाडलिंग की याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है।
केस का शीर्षक: सुरेंद्र पुंडलिक गाडलिंग बनाम महाराष्ट्र राज्य
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