आगरा ।
आगरा के थाना जगनेर से जुड़े एक बहुचर्चित मामले में न्यायालय ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए जानलेवा हमले और अवैध खनन के चार आरोपियों को बरी कर दिया है।
विशेष न्यायाधीश (दस्यू प्रभावी क्षेत्र) माननीय नीरज कुमार महाजन ने साक्ष्यों की कमी और विवेचना में रही बड़ी खामियों को आधार मानते हुए आरोपी रवि, सुखराम, लवकुश और मदन सिंह को दोषमुक्त करने के आदेश जारी किए।
अभियोजन की कहानी और पुलिसिया दावे:
थानाध्यक्ष कुशल पाल सिंह द्वारा दर्ज कराए गए मुकदमे के अनुसार, यह घटना 9 सितंबर 2020 की है। पुलिस दल जगनेर इलाके में गश्त पर था, तभी धौलपुर की ओर से अवैध चंबल बालू लदी ट्रैक्टर-ट्रॉलियां आती दिखाई दीं।
पुलिस ने जब उन्हें रोकने का प्रयास किया, तो आरोपियों ने ट्रैक्टर चालक को पुलिसकर्मियों पर वाहन चढ़ाने के लिए उकसाया।
आरोप था कि खनन माफियाओं ने पुलिस दल पर जान से मारने की नीयत से फायरिंग की, जिसके जवाब में पुलिस ने भी सात राउंड फायर किए।
इस मुठभेड़ में एक आरोपी घायल हुआ था और दो को मौके से गिरफ्तार किया गया था, जबकि दो अन्य आरोपी ट्रैक्टर लेकर भागने में सफल रहे थे।

न्यायालय में उजागर हुईं जांच की कमियां:
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता विनोद कुमार राजपूत ने पुलिस की कहानी पर कई तकनीकी और विधिक सवाल खड़े किए।
न्यायालय ने पाया कि पुलिस की विवेचना में निम्नलिखित गंभीर लापरवाही बरती गई:
* पुलिस ने आरोपियों के पास से तमंचे बरामद करने का दावा तो किया, लेकिन उनकी जांच विधि विज्ञान प्रयोगशाला से नहीं कराई।
* मौके से आरोपियों द्वारा चलाए गए कारतूसों के खोखे बरामद कर अदालत में पेश नहीं किए गए, जिससे फायरिंग की पुष्टि नहीं हो सकी।
* पुलिस जीप से पीछा करने का दावा करती रही, लेकिन मौके से भागते ट्रैक्टर को बरामद नहीं किया जा सका।
* पूरी कार्रवाई के दौरान पुलिस ने किसी भी स्वतंत्र स्थानीय गवाह को शामिल नहीं किया, जबकि कानूनन यह अनिवार्य प्रक्रिया है।
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न्यायालय का निष्कर्ष:
न्यायाधीश माननीय नीरज कुमार महाजन ने मामले का निस्तारण करते हुए टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।
स्वतंत्र गवाहों के अभाव और बरामद हथियारों की फॉरेंसिक जांच न होने के कारण पुलिस के कथनों पर विश्वास करना संभव नहीं है।
इन विधिक त्रुटियों का लाभ देते हुए न्यायालय ने चारों आरोपियों को बरी कर दिया।
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