आगरा/प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस और साइबर सेल द्वारा बैंक खातों को बिना किसी ठोस आधार या पूर्व सूचना के फ्रीज किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि बैंक खातों पर रोक लगाने जैसी कार्रवाई केवल कानून द्वारा निर्धारित पारदर्शी प्रक्रिया के तहत ही की जा सकती है।
बैंकिंग व्यवस्था में ‘भरोसा’ कायम रखना बैंक की जिम्मेदारी
यह महत्वपूर्ण आदेश न्यायमुर्ति अतुल श्रीधरन तथा न्यायमुर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने तारकेश्वर तिवारी समेत अन्य कई याचिकाओं पर संयुक्त सुनवाई करते हुए दिया।
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि उनके खातों को बिना किसी नोटिस या कारण बताए अचानक फ्रीज कर दिया गया।
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सुनवाई के दौरान अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:
* सुरक्षा का विश्वास: लोगों की गाढ़ी कमाई बैंकों में सुरक्षित है, इस विश्वास को बनाए रखना बैंकों की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
* केवल पत्र पर कार्रवाई गलत: बैंक अक्सर केवल पुलिस या साइबर सेल के एक पत्र मात्र पर तुरंत खाते फ्रीज कर देते हैं, जो कि बैंकिंग सिद्धांतों के विरुद्ध है।
* दस्तावेजों का अभाव: फ्रीज करने के बाद खाताधारकों को न तो कारण बताए जाते हैं और न ही जरूरी दस्तावेज दिए जाते हैं, जो न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
कोर्ट ने बैंकों और केंद्र सरकार को दिए सख्त निर्देश:
अदालत ने बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित निर्देश जारी किए हैं:
* रिकॉर्ड पेश करें: बैंक खाते फ्रीज करने से संबंधित सभी पत्र और रिकॉर्ड अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें।
* स्थिति स्पष्ट करें: यह बताया जाए कि क्या पूरा बैंक खाता रोका गया है या केवल संदिग्ध राशि (Disputed Amount) को ही होल्ड किया गया है।
* स्टेटमेंट देना अनिवार्य: खाताधारकों द्वारा मांग किए जाने पर बैंक स्टेटमेंट उपलब्ध कराना बैंकों के लिए अनिवार्य होगा।
* SOP की मांग: कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस संबंध में मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और कानूनी प्रावधानों की विस्तृत जानकारी मांगी है।
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अगली सुनवाई 26 फरवरी को:
अदालत ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई की तिथि 26 फरवरी को दोपहर 2:00 बजे निर्धारित की है।
तब तक संबंधित विभागों और बैंकों को अपना पक्ष और रिकॉर्ड पेश करने होंगे।
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