आगरा/प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि अपनी मर्जी से किसी अन्य मेडिकल कॉलेज या अस्पताल से कराई गई जांच रिपोर्ट के आधार पर आधिकारिक ‘मेडिकल बोर्ड’ और ‘पुनः जांच बोर्ड’ (Review Medical Board) की रिपोर्ट को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने तीसरी बार मेडिकल जांच कराने की मांग वाली याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह आदेश न्यायमूर्ति विकास बुधवार की एकलपीठ ने प्रवीण कुमार द्वारा दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
याचिका पर याची की ओर से अधिवक्ता अदितेंद्र सिंह और भारत सरकार की ओर से अधिवक्ता दीपक सिंह ने पक्ष रखा।
पूरा प्रकरण निम्नलिखित है:
* याची ने पैरामिलिट्री फोर्स में कांस्टेबल भर्ती की परीक्षा दी थी।
* आधिकारिक मेडिकल जांच के दौरान उसकी दोनों आंखों में खामी पाई गई, जिसके आधार पर उसे ‘अनफिट’ करार दिया गया।
* नियम के अनुसार याची की दोबारा जांच (Review Medical) कराई गई, लेकिन विशेषज्ञ बोर्ड ने पुनः उसे अनफिट पाया।
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* इसके बाद याची ने अपनी मर्जी से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में जांच कराई, जहाँ की रिपोर्ट में उसकी दाईं आंख को सही बताया गया। इसी निजी रिपोर्ट को आधार बनाकर याची ने तीसरी बार मेडिकल बोर्ड गठित करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट का कड़ा रुख:
अदालत ने याचिका पर हस्तक्षेप करने से इंकार करते हुए कहा कि केवल इसलिए कि अभ्यर्थी ने अपनी सुविधा के अनुसार किसी मेडिकल कॉलेज से अनुकूल रिपोर्ट प्राप्त कर ली है, विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड के निष्कर्षों पर संदेह नहीं किया जा सकता।
कोर्ट की टिप्पणी:
“विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को तब तक अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता जब तक कि उसमें कोई गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटि न हो। अपनी पसंद के अस्पताल की रिपोर्ट के आधार पर बार-बार जांच की मांग करना उचित नहीं है।”
कोर्ट ने माना कि पैरामिलिट्री फोर्स जैसी सेवाओं में शारीरिक मानक अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं और विशेषज्ञ बोर्ड की दोहरी जांच के बाद किसी अन्य रिपोर्ट को प्राथमिकता देना सुरक्षा मानकों से समझौता होगा। कोर्ट ने केस को ‘संदिग्ध’ मानने से इंकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।
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