आगरा /प्रयागराज 29 सितंबर ।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पति-पत्नी के बीच विवाद में यदि क्रूरता को लेकर लगाए गए आरोप साबित नहीं होते हैं तो अधीनस्थ न्यायालय क्रूरता के आधार पर तलाक की डिक्री मंजूर नहीं कर सकता है। इस आधार पर न्यायालय ने तलाक की डिक्री को रद्द कर दिया।
यह आदेश न्यायमूर्ति एस.डी.सिंह और न्यायमूर्ति डी.रमेश की खंडपीठ ने कविता की अपील पर विभु राय को सुनकर दिया।
न्यायालय ने क्रूरता के आधार पर प्रधान परिवार न्यायालय बागपत द्वारा 4 सितंबर 2015 को दी गई तलाक की डिक्री को रद्द कर दिया है। मामले के अनुसार कविता और रोहित कुमार की शादी वर्ष 2011 में हुई थी ।

उनके कोई संतान नहीं हुई। शादी के 2 वर्ष बाद पति रोहित ने परिवार न्यायालय में तलाक का मुकदमा यह कहते हुए दाखिल किया कि उसकी पत्नी झगड़ालू प्रकृति की है और शादी के बाद से ही ससुराल वालों के प्रति उसका व्यवहार अच्छा नहीं है।
पत्नी द्वारा क्रूरता किए जाने को लेकर पति की ओर से जिन दो घटनाओं का उल्लेख भी किया। इसका मुकदमा दर्ज कराया गया। बाद में ट्रायल में सभी आरोपी बरी हो गए।
फैमिली कोर्ट ने इन घटनाओं के आधार पर पत्नी द्वारा क्रूरता किए जाने का आधार पाते हुए तलाक की डिक्री को मंजूरी दे दी।
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अपीलार्थी के अधिवक्ता का कहना था कि उसे पर लगाए गए क्रूरता के आरोप कभी साबित नहीं किया जा सके । सभी आरोप झूठे पाए गए यहां तक की दूसरी घटना की प्राथमिक भी नहीं दर्ज कराई गई थी। जबकि प्रतिवादी स्वयं पुलिस अधिकारी है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे पर लगाए गए आरोप साबित नहीं किया जा सके हैं ।
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