आगरा।
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग-प्रथम ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ‘दि न्यू इण्डिया एश्योरेंस कम्पनी’ को आदेश दिया है कि वह मृतक के माता-पिता को बीमा राशि और हर्जाने का भुगतान करे।
आयोग ने स्पष्ट किया कि केवल कागजात जमा करने में देरी जैसे तकनीकी कारणों से किसी का जायज क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता।
क्या था पूरा मामला ?
आगरा के शकुंतला नगर निवासी श्रीमती मीना देवी और उनके पति रमेश चंद के पुत्र नेत्रपाल सिंह की 5 जुलाई 2015 को एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी।
नेत्रपाल का केनरा बैंक में बचत खाता था और वह ‘प्रधानमंत्री जनधन योजना’ (PMJDY) के तहत रूपे कार्ड धारक था।
योजना के नियमों के अनुसार, मृतक के परिजन कुल 3,30,000/- रुपये की बीमा राशि पाने के हकदार थे।
बीमा कंपनी ने यह कहते हुए क्लेम खारिज कर दिया था कि परिजनों ने निर्धारित 90 दिनों की अवधि के भीतर आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए।

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी:
सुनवाई के दौरान आयोग के अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह ने परिजनों के पक्ष में सहानुभूति दिखाते हुए कहा:
* पुत्र शोक का सम्मान: पुत्र की मृत्यु से दुखी माता-पिता से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे तत्काल सारे दस्तावेज जुटा लें।
* मानवीय दृष्टिकोण: यदि वांछित प्रपत्रों में कुछ देरी हुई है, तो यह क्लेम निरस्त करने का उचित आधार नहीं है।
* सुप्रीम कोर्ट का हवाला: आयोग ने ‘गुरुमेल सिंह बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी’ मामले का जिक्र करते हुए कहा कि बीमा कंपनियों को तकनीकी पहलुओं में उलझने के बजाय मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
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आयोग का आदेश:
आयोग ने विपक्षी बीमा कंपनी (प्रतिपक्षी संख्या 3 व 4) को दोषी पाते हुए निम्नलिखित आदेश दिए:
* बीमा राशि: 3,00,000/- रुपये की कुल बीमा राशि 6% वार्षिक ब्याज के साथ (वर्ष 2020 से भुगतान की तिथि तक) प्रदान करें।
* मानसिक क्षतिपूर्ति: पीड़ित माता-पिता को हुई मानसिक पीड़ा के लिए 20,000/- रुपये का भुगतान करें।
* वाद व्यय: कानूनी कार्यवाही के खर्च के रूप में 5,000/- रुपये अलग से दें।
* जुर्माना: यदि 45 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो ब्याज दर 6% से बढ़ाकर 9% कर दी जाएगी।
आयोग ने बैंक (प्रतिपक्षी संख्या 1 व 2) के विरुद्ध परिवाद को खारिज कर दिया है।
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