आगरा ।
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग-प्रथम, आगरा ने एक महत्वपूर्ण फैसले में चिकित्सीय लापरवाही और सेवा में कमी के चलते एक डॉक्टर और उनकी बीमा कंपनी को मृतक के परिवार को ₹1,66,279/- का मुआवजा देने का आदेश दिया है।
मामले का संक्षिप्त विवरण:
परिवादी उमाकेश पुत्र स्व. छदरूराम ने डॉक्टर पुरुषोत्तम टंडन और द न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (बीमा कंपनी) के विरुद्ध अपने 18 वर्षीय पुत्र दीपक की मृत्यु के संबंध में यह परिवाद दायर किया था।
* घटना: परिवादी का पुत्र दीपक 10/11.02.2016 को मोटरसाइकिल दुर्घटना में घायल हो गया और उसके पैर की जांघ में फ्रैक्चर हो गया।
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* पहला इलाज: उसे श्रीराम हॉस्पीटल, आगरा ले जाया गया, जहाँ ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. पुरुषोत्तम टंडन (प्रतिपक्षी संख्या 01) ने उसकी दाहिनी टांग का ऑपरेशन 11.02.2016 को शाम 5:45 बजे किया।
* बिगड़ती हालत: ऑपरेशन के अगले दिन दीपक की हालत खराब होने लगी और उसे साँस लेने में समस्या होने लगी।
* अस्पताल बदलाव: डॉ. टंडन ने डॉ. अरविंद जैन (प्रतिपक्षी संख्या 02) को बुलाया, जिन्होंने आधुनिक मशीनरी की कमी बताकर उसे दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने को कहा। 13.02.2016 को मरीज को साँई ट्रामा एण्ड हॉस्पीटल, कमलानगर रेफर किया गया, और बाद में 14.02.2016 को जी. जी. हॉस्पीटल, संजय प्लेस रेफर किया गया।
* मृत्यु: दुर्भाग्य से, परिवादी के पुत्र दीपक की मृत्यु 14.02.2016 को लगभग 11:30 बजे जी. जी. हॉस्पीटल में गलत इलाज और सेप्टिसीमिया के कारण हो गई।
आयोग का निष्कर्ष:
न्यायालय, जिसमें माननीय सर्वेश कुमार (अध्यक्ष) और राजीव सिंह (माननीय सदस्य) शामिल थे, ने 03.11.2025 को अपना निर्णय सुनाया:
* उपभोक्ता-सेवा प्रदाता संबंध: आयोग ने माना कि परिवादी ने इलाज के लिए फीस दी थी (₹31,279/- के बिल प्रस्तुत किए गए)। अतः, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 2(1)(डी) के तहत परिवादी उपभोक्ता और चिकित्सक सेवा प्रदाता हैं।
* चिकित्सीय लापरवाही: आयोग ने पाया कि ऑपरेशन के बाद डॉ. पुरुषोत्तम टंडन ने चिकित्सीय मानकों के अनुसार देखभाल नहीं की। साँस रुकने की स्थिति में, डॉ. टंडन किसी वरिष्ठ फिजीशियन या कार्डियोलॉजिस्ट को बुलाकर परामर्श ले सकते थे या एस. एन. मेडिकल कॉलेज जैसे हायर मेडिकल सेंटर रेफर कर सकते थे।
* डॉक्टर द्वारा एडमिशन सीट पर LAMA (चिकित्सीय सलाह के बिना अस्पताल छोड़ना) गलत तरीके से अंकित करना, लापरवाही छिपाने का प्रयास माना गया। इस प्रकार, डॉ. टंडन ने सेवा में कमी की और चिकित्सीय लापरवाही बरती है।
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* डॉ. अरविंद जैन के खिलाफ परिवाद खारिज: डॉ. अरविंद जैन के खिलाफ कोई लिखित कथन प्रस्तुत नहीं किया गया था और उनकी ओर से एकपक्षीय सुनवाई हुई। आयोग ने उनके विरुद्ध परिवाद खारिज कर दिया।
* बीमा कंपनी की जिम्मेदारी: डॉ. टंडन के पास ₹10,00,000/- की ‘डॉक्टर्स इंडेमिनिटी पॉलिसी’ (वैधता दिनांक 15.12.2015 से 14.12.2016) थी।
इसलिए, बीमा कंपनी (प्रतिपक्षी संख्या 03) को डॉ. टंडन द्वारा की गई चिकित्सीय लापरवाही के लिए क्षतिपूर्ति / प्रतिकर का भुगतान करने के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी ठहराया गया।
मुआवजे का विवरण:
आयोग ने परिवादी को पुत्र की मृत्यु, इलाज के खर्च, मानसिक पीड़ा और वाद व्यय के मद में कुल ₹1,66,279/- की धनराशि दिलाए जाने को न्यायसंगत माना है।
इलाज का खर्च (बिल के आधार पर): ₹31,279/-
मानसिक पीड़ा की क्षतिपूर्ति (पुत्र सुख से वंचित होने के लिए) : ₹1,00,000/-
प्रेम व स्नेह के मद में क्षतिपूर्ति : ₹25,000/-
वाद व्यय : ₹10,000/-
कुल धनराशि : ₹1,66,279/-
बीमा कंपनी को आदेश दिया गया है कि वह निर्णय की तिथि से 45 दिन के भीतर यह धनराशि, 22.07.2016 (परिवाद की प्रस्तुति का दिनांक) से भुगतान की वास्तविक दिनांक तक 06% वार्षिक साधारण ब्याज सहित आयोग के खाते में जमा करना सुनिश्चित करे। चूक होने पर ब्याज दर 09% वार्षिक साधारण ब्याज होगी।
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