सांसद कंगना रनौत के खिलाफ ‘गटर जनरेशन’ टिप्पणी मामले में रिवीजन याचिका निरस्त, अदालत ने कहा- परिवादी को विधिक अधिकार नहीं

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आगरा ।

भाजपा सांसद कंगना रनौत द्वारा नीट परीक्षार्थियों के प्रदर्शन पर की गई ‘गटर जनरेशन’ की टिप्पणी के मामले में प्रस्तुत रिवीजन याचिका को जिला जज ने पोषणीय न पाते हुए अंगीकरण के स्तर पर ही निरस्त कर दिया है।

अदालत ने पत्रावली को दाखिल दफ्तर करने के आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि परिवादी कथित घटना का न तो पीड़ित है और न ही व्यथित व्यक्ति है।

राजीव गांधी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं अधिवक्ता रमाशंकर शर्मा ने विशेष मजिस्ट्रेट (एमपी/एमएलए) माननीय अनुज कुमार सिंह के आदेश के खिलाफ जिला जज की अदालत में यह रिवीजन दाखिल किया था।

परिवाद के अनुसार, नीट और अन्य परीक्षाओं में पेपर लीक होने से आहत छात्रों द्वारा दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन किया जा रहा था। आरोप था कि 27 जुलाई को भाजपा सांसद कंगना रनौत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर प्रदर्शनकारियों को ‘गटर जनरेशन’ कहा, जिससे परिवादी और उनके साथियों की भावनाएं आहत हुईं।

परिवादी ने बीएनएस की विभिन्न धाराओं (152, 196, 197, 299, 352, 356) के तहत कंगना रनौत को विचारण हेतु तलब करने की मांग की थी।

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अधीनस्थ न्यायालय द्वारा प्रतिकूल आदेश पारित होने पर यह मामला जिला जज के समक्ष पहुंचा।

जिला जज ने परिवादी और जिला शासकीय अधिवक्ता राधा कृष्ण गुप्ता के तर्कों को सुनने के बाद अपने विस्तृत आदेश में कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) एवं 19(2) के आलोक में, किसी सार्वजनिक विषय पर की गई कठोर और विवादास्पद टिप्पणी नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत आती है।

इससे सामाजिक या राजनीतिक असहमति उत्पन्न हो सकती है, लेकिन यह अपने आप में कोई आपराधिक कृत्य नहीं है।

न्यायालय ने मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए यह भी पाया कि परिवादी द्वारा प्रस्तुत अपने पुत्र के हाईस्कूल शैक्षिक प्रमाण पत्र के अनुसार, कथित टिप्पणी के समय वह अवयस्क था।

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इसलिए उसका नीट परीक्षा में शामिल होना या इस टिप्पणी से उसकी भावनाओं को ठेस पहुंचना नहीं माना जा सकता। इसके अलावा, घटना के समय परिवादी और उसका पुत्र जंतर-मंतर पर घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं थे। यदि कोई टिप्पणी की गई थी, तो वह मुख्य रूप से वहां मौजूद छात्रों के लिए थी।

इन समस्त विधिक पहलुओं और तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि परिवादी द्वारा प्रस्तुत परिवाद विधिक अधिकार के अभाव से ग्रसित है, जिसके फलस्वरूप रिवीजन को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया गया।

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विवेक कुमार जैन
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