आगरा कोर्ट का फैसला: सबूतों के अभाव में 19 साल पुराने वाहन चोरी व फर्जीवाड़े के मामले में दो आरोपी बरी

न्यायालय मुख्य सुर्खियां

आगरा, 3 नवंबर।

ताजनगरी आगरा की एक अदालत ने 19 साल पुराने वाहन चोरी और फर्जीवाड़े के एक मामले में पुलिस जांच की कमियों को उजागर करते हुए दो आरोपियों को ससम्मान दोषमुक्त कर दिया है।

अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (न्यायालय संख्या-04) माननीय प्रगति सिंह की अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष (पुलिस) अपने आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।

क्या था पुलिस का दावा ?

कोतवाली थाने में दर्ज मुकदमे के अनुसार, 14 अप्रैल 2007 की रात गश्त के दौरान पुलिस और एसओजी की टीम ने धूलियागंज चौराहे के पास एक टाटा 709 गाड़ी को पकड़ा था।

पुलिस का दावा था कि इस गाड़ी पर फर्जी नंबर प्लेट (HR46B6802) लगी थी। मौके से कुलदीप (चालक), मुकेश और विनोद को पकड़ा गया। पुलिस के अनुसार, मुकेश से एक तमंचा बरामद हुआ था।

पूछताछ के बाद आरोपियों की निशानदेही पर राजामंडी स्टेशन से एक बैग भी बरामद किया गया, जिसमें 90 हजार रुपये नकद थे। पुलिस का आरोप था कि यह रकम एक चोरी की स्कार्पियो बेचकर हासिल की गई थी। (इस मामले में दो अन्य आरोपियों कुलदीप और विनोद की फाइल न्यायालय द्वारा 2019 में ही अलग कर दी गई थी)।

अदालत में खुली पुलिस जांच की पोल:

मामले की सुनवाई के दौरान पुलिस की कहानी में कई बड़ी खामियां सामने आईं। अदालत ने अपनी टिप्पणी में पाया कि पुलिस ने जिस टाटा 709 और स्कार्पियो को चोरी का बताया था, उनकी चोरी की कोई भी प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) पत्रावली में दाखिल ही नहीं की गई।

दूसरा जांच अधिकारी ने पकड़ी गई गाड़ी के असली नंबर या उसके असली मालिक का पता लगाने का कोई प्रयास नहीं किया।

सार्वजनिक स्थान (धूलियागंज चौराहे) पर गिरफ्तारी और राजामंडी स्टेशन से 90 हजार रुपये की बरामदगी के दौरान पुलिस ने किसी भी स्वतंत्र (पब्लिक) व्यक्ति को गवाह नहीं बनाया।

आरोपियों ने अपने बयान में राजेश चौधरी नामक व्यक्ति को गाड़ियां बेचने की बात कही थी, लेकिन पुलिस ने न तो उससे कोई पूछताछ की और न ही उसे मामले में वांछित किया।

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बचाव पक्ष की दलील और अंतिम फैसला:

बचाव पक्ष की ओर से पेश किए गए गवाह ने अदालत में बताया कि घटना की रात आरोपी समीम उर्फ वकील अपने परिवार के साथ एक शादी समारोह में मौजूद था।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ‘सुब्रमण्यम बनाम कर्नाटक राज्य’ सहित अन्य फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल पुलिस हिरासत में दिए गए बयानों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि स्वतंत्र साक्ष्यों से उसकी पुष्टि न हो।

इन तमाम तथ्यों और सबूतों के अभाव को देखते हुए अदालत ने आरोपी मुकेश और समीम उर्फ वकील को धोखाधड़ी (धारा 420), दस्तावेजों की कूटरचना (धारा 467, 468) और जाली दस्तावेजों के इस्तेमाल (धारा 471) सहित सभी आरोपों से बरी कर दिया।

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विवेक कुमार जैन
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