आगरा/नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं तथा चिकित्सा उपकरणों पर अत्यधिक ट्रेड मार्जिन और भारी मुनाफे को लेकर गंभीर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने मामले के व्यापक जनहित को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि देश की आम जनता के लिए इससे अधिक महत्वपूर्ण कोई अन्य मामला नहीं हो सकता।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ के समक्ष आगरा के अधिवक्ता के.सी. जैन तथा डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई हुई।
इन याचिकाओं में दवाओं व उपकरणों की अत्यधिक कीमतों, भारी मुनाफे और मरीजों को किफायती उपचार उपलब्ध कराने की मांग की गई है।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को अवगत कराया कि केंद्र सरकार ने कैंसर की दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के तीस प्रतिशत तक सीमित करने का निर्णय लिया है।
राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की बैठक में लिए गए इस निर्णय से कैंसर दवाओं की कीमतों में बीस से सत्तर प्रतिशत तक की कमी आने और मरीजों को लगभग पच्चीस सौ करोड़ रुपये की सालाना बचत होने का अनुमान है। इसके लिए गठित विशेषज्ञ समिति दस से पंद्रह दिनों में दवाओं की सूची पर अपनी रिपोर्ट देगी।

इस पर पीठ ने सवाल उठाया कि जब अत्यधिक मार्जिन की समस्या अन्य सभी दवाओं और चिकित्सा उपकरणों में भी मौजूद है, तो सरकार का यह कदम केवल कैंसर की दवाओं तक ही सीमित क्यों रखा जा रहा है।
अदालत ने सुनवाई के दौरान भारी मूल्य अंतर के उदाहरण भी सामने रखे। पीठ ने उल्लेख किया कि भारत में निर्मित एक सामान्य हृदय स्टेंट की खुदरा विक्रेता कीमत पाँच हजार रुपये होती है, जबकि उसकी एमआरपी पच्चीस हजार रुपये तय की जाती है।
इसी प्रकार सलाइन ड्रिप लाइन की कीमत ग्यारह रुपये और एमआरपी दो सौ सत्तर रुपये होने पर भी अदालत ने कड़ा ऐतराज जताया और पूछा कि निर्माता लागत से कई गुना अधिक एमआरपी किस आधार पर तय करते हैं।
केंद्र सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे में भी यह स्वीकार किया गया है कि कैंसर दवाओं में व्यापारिक मार्जिन एक सौ सत्तर से सात सौ प्रतिशत और अस्पतालों में प्रयुक्त उपभोग्य सामग्रियों में सौ से एक हजार प्रतिशत या उससे भी अधिक हो सकता है।
सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बाजार में दवाओं की उपलब्धता और कीमतों के बीच संतुलन बनाए रखने की दलील दी, जिस पर पीठ ने सवाल किया कि क्या मौजूदा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था वाली दवाएं उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचतीं।
सर्वोच्च न्यायालय ने दवाओं के लागत मूल्य और मरीजों से वसूली जाने वाली अंतिम कीमत के भारी अंतर पर कड़ा रुख अपनाते हुए संकेत दिया कि मरीजों को उचित मूल्य पर उपचार सुनिश्चित होना चाहिए। मामले की अगली सुनवाई सत्ताईस अक्टूबर को नियत की गई है।
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