पुलिस की लापरवाही पड़ी भारी: महिला की हत्या और चोरी के आरोपी साक्ष्यों के अभाव में बरी

न्यायालय मुख्य सुर्खियां

आगरा।

जनपद के थाना सैया क्षेत्र में करीब 16 वर्ष पूर्व हुई एक सनसनीखेज वारदात—चोरी के दौरान महिला की गोली मारकर हत्या—के मामले में न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया है।

अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ADJ-1) माननीय पुष्कर उपाध्याय ने मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी प्रेम और महेश को दोषमुक्त (बरी) करने के आदेश दिए हैं।

अदालत ने अपने निर्णय में पुलिस की विवेचनात्मक कमियों और साक्ष्यों की कमी को मुख्य आधार माना।

क्या था मामला ?

घटना 3 मई 2010 की है। थाना सैया के खैरागढ़ निवासी वादी भोज राज के घर में देर रात अज्ञात चोर घुस आए थे। बदमाशों ने घर से तीन बकरियां, पीतल के बर्तन और अन्य सामान चोरी कर लिया था।

इसी दौरान वादी की 38 वर्षीया पत्नी शकुंतला देवी की नींद खुल गई। साहस का परिचय देते हुए उन्होंने एक बदमाश को दबोच लिया, जिसके बाद अन्य बदमाशों ने उन पर गोली चला दी, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

पुलिसिया कार्रवाई और कानूनी मोड़:

पुलिस ने अज्ञात के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर विवेचना शुरू की थी। महीनों बाद अन्य मामलों में पकड़े गए बदमाशों ने इस हत्याकांड को कबूल किया, जिसके आधार पर पुलिस ने प्रेम (बागपत), महेश (किरावली), लाला उर्फ वकील (कागारोल) और वीरी (खैरागढ़) के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया।

* कार्यवाही के दौरान आरोपी लाला उर्फ वकील की मृत्यु हो गई।

* आरोपी वीरी सिंह की पत्रावली (File) मुख्य केस से पृथक कर दी गई थी।

बरी होने के मुख्य कारण:

अदालत में बचाव पक्ष के अधिवक्ता जैकी सिंह के तर्कों और साक्ष्यों के परिशीलन के बाद न्यायालय ने पाया कि पुलिस केस साबित करने में विफल रही।

बरी किए जाने के पीछे निम्नलिखित विधिक कारण प्रमुख रहे:

* शिनाख्त की कार्यवाही का अभाव: घटना के समय बदमाश अज्ञात थे। पुलिस ने वादी या अन्य प्रत्यक्षदर्शी गवाहों से आरोपियों की शिनाख्त (Identification Parade) नहीं कराई।

* बरामदगी की विफलता: पुलिस आरोपियों से चोरी गया कोई भी सामान या हत्या में प्रयुक्त हथियार बरामद करने में नाकाम रही।

* संदेह का लाभ: अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि जो लोग पकड़े गए हैं, वही उस रात घटनास्थल पर मौजूद थे।

न्यायालय का निष्कर्ष:

एडीजे प्रथम माननीय पुष्कर उपाध्याय ने स्पष्ट किया कि केवल कबूलनामे के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती जब तक कि उसे ठोस साक्ष्यों (जैसे शिनाख्त और बरामदगी) से पुष्ट न किया जाए।

इसी आधार पर आरोपी प्रेम और महेश को बरी कर दिया गया।

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विवेक कुमार जैन
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