आगरा।
मुन्नालाल गुप्ता बनाम बैंक ऑफ बड़ौदा के मामले में उपभोक्ता अदालत प्रथम के हस्तक्षेप के बाद परिवादी को लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अंततः अपना हक मिल गया है।
यह प्रकरण बनारस स्टेट बैंक के शेयरों के बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय के बाद उनके बदले भुगतान न मिलने से संबंधित था।
मामले के अनुसार, परिवादी मुन्नालाल गुप्ता ने वर्ष 1998 में बनारस स्टेट बैंक के 1,000/- शेयर खरीदे थे। वर्ष 2002 में इस बैंक का विलय बैंक ऑफ बड़ौदा में हो गया, जिससे इसकी समस्त संपत्तियों और देयताओं की जिम्मेदारी बैंक ऑफ बड़ौदा पर आ गई।
परिवादी का आरोप था कि विलय के बावजूद बैंक ने उन्हें न तो नए शेयर आवंटित किए और न ही उनकी तत्कालीन बाजारी कीमत अदा की।
जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष फोरम, आगरा ने वर्ष 2016 में बैंक की इस देरी को सेवा में कमी माना था।
इस निर्णय के विरुद्ध बैंक ने राज्य उपभोक्ता आयोग, लखनऊ में अपील दायर की थी। राज्य आयोग ने 7 अक्टूबर 2022 को अपने आदेश में जिला फोरम के निर्णय को संशोधित किया और बैंक को निर्देश दिया कि वह केंद्र सरकार की ‘बी.एस.बी.एल. (अमलगेमेशन विथ बैंक ऑफ बड़ौदा) स्कीम 2002’ और संबंधित अधिसूचना के अनुसार शेयरों की आनुपातिक धनराशि 6 माह के भीतर परिवादी को प्रदान करे। आयोग ने स्पष्ट किया कि इतने लंबे समय तक भुगतान न करना न्यायसंगत नहीं है।
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प्रकरण के नवीनतम विकास में, जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (प्रथम), आगरा के समक्ष चली निष्पादन प्रक्रिया के दौरान अप्रैल 2026 में अंतिम आदेश आयोग के अध्यक्ष माननीय सर्वेश कुमार और सदस्य राजीव सिंह द्वारा पारित किया गया। राज्य आयोग के निर्देशों का पालन करते हुए विपक्षी बैंक ने भुगतान की प्रक्रिया पूर्ण की।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, 15 अप्रैल 2026 को पंजाब नेशनल बैंक के माध्यम से 80,678/- रुपये (अस्सी हजार छह सौ अठहत्तर रुपये) की धनराशि का बैंक ड्राफ्ट जिला उपभोक्ता आयोग, आगरा के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
यह ड्राफ्ट परिवादी मुन्नालाल गुप्ता के नाम जारी किया गया, जिसे अदालत के आदेशानुसार उन्हें सौंप दिया गया है। इस भुगतान के साथ ही शेयरों की धनराशि को लेकर चल रहा यह विवाद पूरी तरह निस्तारित हो गया है।
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