जिला और सत्र न्यायालय आगरा ने आवास विकास परिषद की बंधक भूमि का अवैध रूप से बैनामा करने के मामले में नामजद आरोपी मून गोयल की अग्रिम जमानत याचिका की खारिज, हाईकोर्ट के आदेश का पालन न करने पर कोर्ट सख्त

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आगरा।

उत्तर प्रदेश के आगरा जिला स्थित सत्र न्यायालय ने आवास विकास परिषद की बंधक भूमि का अवैध रूप से बैनामा करने के मामले में नामजद आरोपी मून गोयल की अग्रिम जमानत प्रार्थना पत्र को विधिक रूप से विचारणीय न मानते हुए निरस्त कर दिया है।

सत्र न्यायाधीश माननीय संजय कुमार मलिक ने आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया कि जब आरोपी को उच्च न्यायालय से पहले ही दंडात्मक कार्रवाई से संरक्षण प्राप्त है, तो उसे गिरफ्तारी की कोई वास्तविक आशंका नहीं है।

ऐसे में हाईकोर्ट के निर्देशों का अनुपालन किए बिना सीधे सत्र अदालत में दी गई अग्रिम जमानत की अर्जी कानूनी तौर पर विचार योग्य नहीं है।

आवास विकास परिषद की शिकायत पर दर्ज हुआ था मामला:

अभियोजन पक्ष के अनुसार, उत्तर प्रदेश आवास विकास परिषद कार्यालय संपत्ति प्रबंधक, आगरा द्वारा पुलिस को एक शिकायती पत्र दिया गया था।

इसमें कहा गया था कि परिषद की सिकंदरा योजना के सेक्टर-15 में मैसर्स भारत नगर हाउसिंग नामक साझेदारी फर्म की कुल एक लाख ग्यारह हजार छह सौ नवासी दशमलव छह नौ वर्गमीटर भूमि अवस्थित है।

इस फर्म में शुरुआत में मून गोयल, हीरा देवी और शोभिक गोयल साझेदार थे। फर्म की ओर से अधिकृत शोभिक गोयल ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) और निम्न आय वर्ग (एलआईजी) के आवासों के निर्माण के सापेक्ष परिषद के पक्ष में करीब ग्यारह हजार वर्गमीटर से अधिक की भूमि बंधक रखी थी।

बंधक विलेख की शर्तों के तहत जब तक फर्म बीस ईडब्ल्यूएस और बीस एलआईजी मकानों का निर्माण पूरा कर परिषद को सौंप नहीं देती, तब तक इस जमीन का किसी भी रूप में विक्रय या अंतरण नहीं किया जा सकता था।

आरोप है कि इसके बावजूद भागीदार मून गोयल ने तथ्यों को छुपाकर और धोखाधड़ी करते हुए इस बंधक भूमि के विभिन्न भूखंडों का अवैध अंतरण अपने, अपने चचेरे भाई सतीश कुमार गोयल और चचेरे भाई की पत्नी सीमा गोयल के पक्ष में कर दिया।

इससे आवास विकास परिषद को भारी शासकीय और वित्तीय क्षति पहुंची। इसी तहरीर के आधार पर थाना सिकंदरा में भारतीय न्याय संहिता की सुसंगत धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।

पुलिस ने मामले की विवेचना पूरी कर आरोपियों के विरुद्ध न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल कर दिया, जिस पर न्यायालय ने अठारह फरवरी दो हजार छब्बीस को संज्ञान लिया।

आरोपी पक्ष के तर्क:

दूसरी ओर, आरोपी मून गोयल की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उसे इस मामले में पूरी तरह से झूठा फंसाया गया है। उनके वकील का कहना था कि फर्म के एक अन्य साझीदार शोभिक गोयल और उसके पिता अशोक कुमार गोयल ने एक साजिश के तहत पहले पूर्व मृत साझीदार हीरा देवी के हिस्से को हड़पने की कोशिश की।

आरोपी का दावा था कि शोभिक गोयल ने स्वयं विलेख की शर्तों में बदलाव कर लीज डीड निष्पादित की थी, जिससे यह भ्रम पैदा हुआ कि उक्त भूमि अब बंधक मुक्त हो चुकी है। इसी धोखे के कारण सद्भावना पूर्वक यह बैनामा किया गया था।

आरोपी पक्ष ने यह भी दलील दी कि विचारण न्यायालय द्वारा गैर-जमानती वारंट जारी किए जाने के कारण आरोपी को जेल भेजे जाने की आशंका है।

हाईकोर्ट के आदेश और सत्र न्यायालय की टिप्पणी:

मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि आरोपी मून गोयल और अन्य सह-आरोपियों ने पूर्व में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा पांच सौ अट्ठाईस के तहत एक याचिका दायर की थी।

उस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सात मई दो हजार छब्बीस को सतीश कुमार गोयल और सीमा गोयल को राहत प्रदान की थी।

वहीं मून गोयल के संबंध में हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि वह आदेश की तिथि से एक महीने के भीतर संबंधित विचारण न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर नियमित जमानत की अर्जी दाखिल करें।

हाईकोर्ट ने यह भी आदेश दिया था कि इस एक महीने की अवधि तक आरोपी के खिलाफ कोई भी उत्पीड़नात्मक या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।

सत्र न्यायाधीश माननीय संजय कुमार मलिक ने पत्रावली पर उपलब्ध दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद पाया कि हाईकोर्ट द्वारा दी गई एक महीने की राहत की अवधि छह जून दो हजार छब्बीस तक प्रभावी है।

इसके बावजूद आरोपी मून गोयल न तो विचारण न्यायालय के समक्ष उपस्थित हुआ और न ही उसने हाईकोर्ट का वह आदेश निचली अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया।

अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि चूंकि हाईकोर्ट के आदेश के तहत आरोपी को एक महीने तक किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई से सुरक्षा मिली हुई है, इसलिए वर्तमान समय में उसे गिरफ्तार किए जाने का कोई औचित्य या आशंका नहीं दिखाई देती।

कानूनन अग्रिम जमानत का प्रार्थना पत्र तभी विचारणीय होता है जब आरोपी को गिरफ्तारी की वास्तविक आशंका हो।

अतः हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देशों का अनुपालन न करने और वर्तमान परिस्थितियों में गिरफ्तारी की आशंका न होने के कारण सत्र न्यायालय ने मून गोयल की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया।

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विवेक कुमार जैन
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