आगरा/प्रयागराज ।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला को उसके मुश्किल समय में मायके (माता-पिता) से आर्थिक मदद मिल रही है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पति पत्नी को गुजारा भत्ता देने की अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच सकता है।
इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने बुलंदशहर की परिवार अदालत के उस आदेश को पलट दिया है, जिसमें पत्नी के गुजारा भत्ता के दावे को खारिज कर दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि और आरोप-प्रत्यारोप:
इस मामले में पत्नी ने आरोप लगाया था कि उसके पति और ससुराल वालों ने उसका शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न किया।
इसके बाद उसे और उसके बच्चों को मारपीट कर घर से निकाल दिया गया, जिसके बाद पति ने दूसरी शादी भी कर ली।
दूसरी ओर, पति ने इन सभी आरोपों को नकारते हुए अदालत में दलील दी कि उसकी पत्नी बिना किसी ठोस कारण के अपना वैवाहिक घर छोड़कर चली गई।
पति ने पत्नी के चरित्र पर सवाल उठाते हुए किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध संबंध होने का भी आरोप लगाया था।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां:
न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट किए:

* माता-पिता की आय पत्नी की आय नहीं: अदालत ने साफ कहा कि पत्नी के माता-पिता की आय को किसी भी स्थिति में पत्नी की निजी आय नहीं माना जा सकता है। मायके से मिलने वाली आर्थिक मदद पति के कानूनी दायित्व का कोई विकल्प नहीं है।
* चरित्र पर निराधार सवाल उठाना अनुचित: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अवैध संबंधों के आरोप साबित करने के लिए पति की ओर से अदालत में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया। न्यायालय ने कहा कि केवल आरोप, संदेह या चरित्र पर सवाल उठाकर किसी पत्नी को उसके गुजारा भत्ता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।
* बच्चों के भरण-पोषण की राशि अपर्याप्त: अदालत ने यह भी माना कि परिवार अदालत द्वारा बच्चों के लिए तय की गई तीन-तीन हजार रुपये प्रतिमाह की राशि वर्तमान समय की महंगाई को देखते हुए उनकी शिक्षा, भोजन, कपड़े, इलाज और अन्य आवश्यक खर्चों के लिए पूरी तरह से अपर्याप्त है।
न्यायालय का अंतिम आदेश:
इन सभी तथ्यों और तर्कों पर गहनता से विचार करने के बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निम्नलिखित आदेश पारित किए:
* पति को निर्देश दिया गया है कि वह अपनी पत्नी को 5,000/- रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता के रूप में अदा करे।
* दोनों नाबालिग बच्चों के गुजारा भत्ते की राशि को बढ़ाकर 4,000 – 4,000 रुपये प्रतिमाह कर दिया गया है।
हाईकोर्ट का यह फैसला गुजारा भत्ता से जुड़े पारिवारिक विवादों में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल (नजीर) माना जा रहा है, जो यह सुनिश्चित करता है कि संकट के समय में मायके की शरण लेने वाली महिलाओं को उनके भरण-पोषण के कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।
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