आगरा के थाना डौकी क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम बिसारना में हुए एक बहुचर्चित दहेज उत्पीड़न, हत्या और साक्ष्य नष्ट करने के मामले में अदालत ने अपना फैसला सुनाया है।
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे 19) माननीय लोकेश कुमार की अदालत ने इस प्रकरण में आरोपित सास श्रीमती सूरजमुखी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया है।
इसके साथ ही, अदालत ने गवाही से मुकरने (होस्टाइल होने) पर मृतका के पिता के खिलाफ विधिक कार्रवाई करने के सख्त आदेश दिए हैं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, वादी चंद्रभान ने थाना डौकी में मुकदमा दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि उनकी पुत्री शशि का विवाह घटना से नौ वर्ष पूर्व ग्राम बिसारना निवासी सियाराम के पुत्र वीरू उर्फ वीरेंद्र के साथ हुआ था।
वादी का आरोप था कि दामाद ने एक इको कार खरीदी थी, जिसकी किश्त चुकाने के लिए पति, सास सूरजमुखी, ससुर और देवर शशि पर मायके से 50 हजार रुपये लाने का लगातार दबाव बना रहे थे।
प्राथमिकी में यह भी आरोप लगाया गया था कि मांग पूरी न होने पर 11 नवंबर 2019 की शाम ससुराल वालों ने शशि को करंट लगाकर और फांसी देकर मौत के घाट उतार दिया।
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हत्या के बाद साक्ष्य नष्ट करने के उद्देश्य से उसका आनन-फानन में दाह संस्कार भी कर दिया गया। पुलिस ने मामले की विवेचना के उपरांत केवल सास श्रीमती सूरजमुखी के खिलाफ ही अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था।
इस मुकदमे की न्यायिक सुनवाई के दौरान वादी मुकदमा यानी मृतका के पिता चंद्रभान और मृतका की बहन संगीता (जिसका विवाह मृतका के जेठ से हुआ था) सहित कुल 7 अन्य गवाह अदालत में पेश हुए। हालांकि, जिरह के दौरान मुख्य गवाह मृतका के पिता और बहन दोनों ही अदालत में अपनी पूर्व में दी गई गवाही से मुकर गए।
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अभियुक्ता सास की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता अखिलेश कुमार यादव ने अदालत के समक्ष दलील दी कि मुख्य गवाहों के मुकर जाने के कारण अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है।
इन तर्कों से सहमत होते हुए एडीजे 19 माननीय लोकेश कुमार ने सास सूरजमुखी को बरी करने का फैसला सुनाया और अदालत में गवाही से पलटने के कारण मृतका के पिता के विरुद्ध विधिक कार्यवाही शुरू करने के निर्देश दिए।
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