आगरा/प्रयागराज:
उत्तर प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ अपनाए जा रहे ‘बुलडोजर मॉडल’ पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा संपत्तियों को गिराने के संबंध में जारी गाइडलाइन्स के बावजूद राज्य में जारी तोड़फोड़ की कार्रवाई पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जाहिर की है।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि इमारतों को सजा के तौर पर गिराना शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का खुला उल्लंघन है।
क्या है पूरा मामला ?
यह टिप्पणी जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने हमीरपुर निवासी फैमुद्दीन और दो अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की।
याचिकाकर्ताओं ने अपनी संपत्ति को संभावित बुलडोजर कार्रवाई से बचाने के लिए अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की थी।
हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणियां: मुख्य बिंदु:
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल उठाए:
* कानूनी प्रक्रिया का दिखावा: कोर्ट ने कहा कि अक्सर देखा जा रहा है कि अपराध होने के तुरंत बाद रहने की जगह पर कब्जेदारों को नोटिस जारी किया जाता है। इसके बाद कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने का ‘दिखावा’ कर इमारत को ढहा दिया जाता है।

* सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना: हाईकोर्ट ने हैरानी जताई कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट फैसले के बावजूद उत्तर प्रदेश में दंडात्मक कार्रवाई के रूप में तोड़फोड़ जारी है।
* न्यायपालिका का अधिकार: बेंच ने दोहराया कि सजा देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है। कार्यपालिका (प्रशासन) खुद ही जज बनकर किसी के घर पर बुलडोजर नहीं चला सकती।
* संवैधानिक मर्यादा: कोर्ट ने कहा कि किसी इमारत को सजा के तौर पर गिराना उस सिद्धांत का उल्लंघन है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पुख्ता किया था।
“अदालत ऐसे कई मामलों की गवाह है जहाँ अपराध होते ही नोटिस थमा दिया जाता है और फिर कानूनी जरूरतों को पूरा करने का महज स्वांग रचकर संपत्तियों को जमींदोज कर दिया जाता है।” –इलाहाबाद हाईकोर्ट
भविष्य की कार्रवाई:
हाईकोर्ट की इस सख्त टिप्पणी के बाद अब शासन और प्रशासन के उन अधिकारियों पर सवाल खड़े हो रहे हैं जो सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन्स की अनदेखी कर रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं को फिलहाल कोर्ट से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है।
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