कोर्ट ने कहा कार्यकारिणी परिषद के याची को प्रोन्नति प्रस्ताव को रोकने में तीन साल की देरी क्यों ?
आगरा / प्रयागराज 27 सितंबर।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी (बीएचयू) के कुलपति को निर्देश दिया कि वे अपना व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर बताएं कि उन्होंने 4 जून, 2021 को कार्यकारिणी परिषद द्वारा पारित प्रस्ताव के कार्यान्वयन को तीन साल तक क्यों रोके रखा है ?
जिसे आज तक लागू नहीं किया गया है और याचिकाकर्ता को लाभ से वंचित किया गया है।
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यह आदेश न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के आयुर्वेद आयुर्विज्ञान संस्थान के सहायक प्रोफेसर डॉ सुशील कुमार दुबे की याचिका पर दिया है।
जिन्हें तीन साल पहले कार्यकारी परिषद के प्रस्ताव के बावजूद पदोन्नति लाभ से वंचित किया जा रहा है। याची का कहना है कि उसकी नियुक्ति 27 जनवरी 09 को राजकीय आयुर्वेदिक कालेज वाराणसी में हुई थी। 2018 मे वह बीएचयू में सहायक प्रोफेसर नियुक्त हुआ।

उसने पिछली सेवा जोड़ने की कैरियर एडवांस स्कीम के तहत प्रोन्नति की मांग की। जिसे स्वीकार कर उसे सहायक प्रोफेसर स्टेज दो की प्रोन्नति दी गई। इसके बाद 1 मार्च 19 को याची को सहायक प्रोफेसर स्टेज तीन की प्रोन्नति दी गई और कार्यकारिणी परिषद ने 4 जून 21 के प्रस्ताव से अनुमोदित भी कर दिया किंतु इस पर अमल नहीं किया गया।
प्रस्ताव के तीन साल बाद कुलपति ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 23 फरवरी 21 के पत्र का हवाला देते हुए कहा कि पुनर्विचार किए जाने की जरूरत है।
कुलपति के अधिवक्ता राहुल अग्रवाल ने कहा कि स्पष्ट किया जाना है कि याची ने स्टेज दो लगातार पांच साल की सेवा पूरी की है या नहीं।
कोर्ट ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि कुलपति ने तीन साल बाद यह निर्णय लिया। लगता है जानबूझकर यह निर्णय लिया गया है और कुलपति से इसकी सफाई मांगी है।
याचिका की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी।
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