आगरा/प्रयागराज:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष (Secular) देश में किसी भी व्यक्ति या धर्म को यह दावा करने का अधिकार नहीं है कि उसका ही धर्म “एकमात्र सच्चा धर्म” है।
न्यायालय ने कहा कि ऐसा दावा करना अन्य धर्मों का अपमान करने के समान है और यह कानूनन अपराध की श्रेणी में आ सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि:
यह टिप्पणी जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की एकल पीठ ने मऊ जिले के एक पादरी, रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा, की याचिका को खारिज करते हुए की।
पादरी के विरुद्ध मऊ के मुहम्मदाबाद थाने में आईपीसी की धारा 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना) के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
आरोप था कि वे अपनी प्रार्थना सभाओं में अन्य धर्मों की आलोचना करते हुए ईसाई धर्म को ही एकमात्र सच्चा धर्म बताते थे।
याची ने मऊ कोर्ट द्वारा जारी चार्जशीट और संज्ञान आदेश को बीएनएसएस (BNSS) की धारा 528 के तहत चुनौती दी थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार करने से इंकार कर दिया।

हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ:
न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निम्नलिखित विधिक सिद्धांत स्पष्ट किए:
* संवैधानिक मर्यादा: भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है जहाँ सभी आस्थाओं के लोग मिल-जुलकर रहते हैं। संविधान किसी एक धर्म को अन्य पर श्रेष्ठता की अनुमति नहीं देता।
* धारा 295A का उल्लंघन: कोर्ट ने माना कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर यह प्रचार करता है कि केवल उसका धर्म ही सत्य है, तो यह अन्य वर्गों की धार्मिक मान्यताओं का अपमान करने के ‘दुर्भावनापूर्ण इरादे’ को दर्शाता है। ऐसे कृत्य धारा 295A के दायरे में आते हैं।
* मजिस्ट्रेट के अधिकार: न्यायालय ने नूपुर तलवार बनाम सीबीआई और एस.डब्ल्यू. पलानीतकर मामलों का हवाला देते हुए कहा कि संज्ञान लेते समय मजिस्ट्रेट को केवल यह देखना होता है कि क्या “आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार” मौजूद है। इस स्तर पर ‘मिनी ट्रायल’ या साक्ष्यों का गहरा मूल्यांकन आवश्यक नहीं है।
न्यायालय का निर्णय:
याची के वकील का तर्क था कि जांच अधिकारी ने अवैध धर्मांतरण का कोई साक्ष्य नहीं पाया और यह मामला केवल परेशान करने के उद्देश्य से दर्ज किया गया है।
हालांकि, कोर्ट ने सरकार के तर्कों से सहमति जताते हुए कहा कि एफआईआर के विवरण से प्रथम दृष्टया अपराध बनता प्रतीत होता है।
अंत में कोर्ट ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि साक्ष्यों की सत्यता का निर्धारण ट्रायल (विवादित तथ्यों की जांच) के दौरान होगा, न कि उच्च न्यायालय द्वारा इस स्तर पर।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह आदेश आवेदक को कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी उपचारों का लाभ उठाने से नहीं रोकेगा।
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