आगरा/प्रयागराज।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपहरण और हत्या के 34 साल पुराने एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दो अभियुक्तों की उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अभियुक्तों के खिलाफ दोष को “संदेह से परे” (Beyond reasonable doubt) साबित करने में विफल रहा है, जिसका लाभ अपीलकर्ताओं को मिलना चाहिए।
यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ तथा न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने अनुज सिंह और रामकुमार द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए दिया।
मामले का संक्षिप्त इतिहास:
* घटना: 8 फरवरी 1992 को चंद्रपाल उर्फ चंद्रप्रकाश के अपहरण और हत्या का आरोप लगा था।
* एफआईआर: मृतक के भाई ने घटना के 5 दिन बाद 12 फरवरी 1992 को सहारनपुर के थाना बेहट में मामला दर्ज कराया था।
* निचली अदालत का फैसला: अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सहारनपुर ने 24 सितंबर 2005 को चार आरोपियों बालक राम, विनोद, अनुज सिंह और रामकुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
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* अपील की स्थिति: सुनवाई के दौरान दो अभियुक्तों (बालक राम और विनोद) की मृत्यु हो गई, जिसके बाद केवल अनुज सिंह और रामकुमार की अपील पर सुनवाई हुई।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ:
कोर्ट ने साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए ‘लास्ट सीन थ्योरी’ (अंतिम बार देखे जाने का सिद्धांत) को खारिज कर दिया।
कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ निम्नलिखित रहीं:
* समय और स्थान का अंतर: मृतक को अंतिम बार 7 फरवरी को दिल्ली में देखा गया था, जबकि शव 9 फरवरी को फरीदाबाद में मिला। कोर्ट ने कहा कि अंतिम बार देखे जाने और मृत्यु के समय के बीच इतना लंबा अंतराल है कि किसी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।
* चिकित्सा साक्ष्य: डॉ. एमएस अहलावत की रिपोर्ट अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं करती थी। मेडिकल साक्ष्य के अनुसार मृत्यु 9 फरवरी को हुई हो सकती है, जो अभियोजन के घटनाक्रम से मेल नहीं खाता।
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* कमजोर मकसद (Motive): अपीलकर्ता के वकील चेतन चटर्जी ने दलील दी कि मात्र 7,500 रुपये के लेनदेन को हत्या का पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट खंडपीठ ने माना कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी अधूरी है।
कोर्ट ने कहा कि ‘अंतिम बार देखे जाने’ का सिद्धांत इस मामले में कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट के 2005 के फैसले को पलटते हुए दोनों जीवित अभियुक्तों को तुरंत बरी करने का आदेश दिया।
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