दुराचार और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में आरोपी आरक्षी बरी

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नर्स ने पुलिसकर्मी के कमरे पर की थी आत्महत्या, साक्ष्यों के अभाव में मिली राहत
एसीपी छत्ता कार्यालय में तैनात था आरोपी सिपाही राघवेंद्र सिंह

आगरा।

विशेष न्यायालय एससी-एसटी एक्ट के न्यायाधीश माननीय शिव कुमार ने अपहरण, दुराचार, दलित उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए विवश करने के गंभीर आरोपों में घिरे आरक्षी (सिपाही) राघवेंद्र सिंह को बरी करने के आदेश दिए हैं।

अदालत ने यह फैसला अभियोजन पक्ष द्वारा आरोपों को संदेह से परे साबित न कर पाने और साक्ष्यों के अभाव में सुनाया है।

क्या था मामला ?

मामला 28 दिसंबर 2023 का है। थाना छत्ता में दर्ज मुकदमे के अनुसार, वादी की 22 वर्षीय बहन गुरुग्राम के एक निजी अस्पताल में नर्स थी। आरोप था कि तत्कालीन एसीपी छत्ता कार्यालय में तैनात आरक्षी राघवेंद्र सिंह (निवासी झांसी) ने उससे शादी का वादा किया था।

वादी का आरोप था कि घटना से 6 माह पूर्व जब वे शादी की बात करने झांसी गए, तो आरोपी के पिता ने जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर उन्हें अपमानित किया।

आरोप के मुताबिक, 28 दिसंबर को राघवेंद्र ने युवती को बेलनगंज स्थित अपने कमरे पर बुलाया, जहाँ उसके साथ दुराचार किया गया और बाद में उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई।

अभियोजन और बचाव पक्ष के तर्क:

पुलिस ने मामले में अपहरण, दुराचार और आत्महत्या के लिए उकसाने की धाराओं में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया था। सुनवाई के दौरान वादी सहित आठ गवाह पेश किए गए।

बचाव पक्ष के अधिवक्ता नीरज पाठक ने दलील दी किघटना का कोई भी चश्मदीद गवाह मौजूद नहीं है। घटनास्थल से मृतका का कोई भी सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ है।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गले पर फंदे के निशान के अतिरिक्त शरीर पर अन्य कोई चोट नहीं पाई गई, जो दुराचार या हाथापाई के आरोपों को झुठलाती है।

गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास है।

अदालत का निर्णय:

अदालत ने पत्रावली पर मौजूद साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध आरोपों को सिद्ध करने में विफल रहा है।

साक्ष्यों की कड़ी टूटने और संदेह का लाभ देते हुए विशेष न्यायाधीश ने आरक्षी राघवेंद्र सिंह को सभी आरोपों से दोषमुक्त (बरी) करने का आदेश दिया।

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विवेक कुमार जैन
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