आगरा।
उत्तर प्रदेश के आगरा स्थित अतिरिक्त न्यायालय संख्या तीन के पीठासीन अधिकारी माननीय महेश नौटियाल ने चेक बाउंस से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है।
न्यायालय ने मामले के सभी तथ्यों और साक्ष्यों का गहराई से अवलोकन करने के बाद अभियुक्त संजय शर्मा को दोषी करार देते हुए दो वर्ष के साधारण कारावास की सजा सुनाई है।
इसके साथ ही अदालत ने दोषी पर पाँच लाख सत्तर रुपये का हर्जाना भी लगाया है, जिसे परिवादी को अदा किया जाएगा।हर्जाना न देने पर दोषी को छह माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा।
यह मामला पराक्रम्य लिखित अधिनियम की धारा 138 के अंतर्गत परिवादी सागर कुमार, निवासी दयालबाग, आगरा द्वारा अभियुक्त संजय शर्मा, निवासी न्यू तिलक नगर, फिरोजाबाद के विरुद्ध दाखिल किया गया था।
परिवाद के अनुसार, जून 2021 में अभियुक्त ने अपनी व्यक्तिगत आवश्यकता के लिए परिवादी से पांच लाख रुपये उधार मांगे थे।
दोनों के बीच पुराने संबंध होने के कारण परिवादी ने अपनी पत्नी के सहयोग से बैंक से दो बार में रकम निकालकर अभियुक्त को पांच लाख रुपये नकद दे दिए थे।
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इस धनराशि की वापसी के लिए अभियुक्त संजय शर्मा ने यूनियन बैंक, शाखा फिरोजाबाद का एक चेक संख्या 036303 दिनांकित 29 नवंबर 2023 को अपने हस्ताक्षर करके परिवादी को सौंपा था।
जब परिवादी सागर कुमार ने उक्त चेक को अपने केनरा बैंक खाते में भुगतान के लिए लगाया, तो वह चेक 1 मार्च 2024 को खाते में अपर्याप्त धनराशि होने की टिप्पणी के साथ बैंक द्वारा अनादरित कर वापस कर दिया गया।
इसके बाद परिवादी ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से अभियुक्त को विधिक नोटिस भेजा, लेकिन अभियुक्त द्वारा न तो कोई संतोषजनक जवाब दिया गया और न ही चेक की राशि का भुगतान किया गया।
विचारण के दौरान अभियुक्त संजय शर्मा ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि उसने चेक को केवल सिक्योरिटी के रूप में दिया था और उसे परिवादी की ओर से कोई विधिक नोटिस प्राप्त नहीं हुआ था।
न्यायालय ने अभियुक्त के इन तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि जब कोई पंजीकृत नोटिस डाकिये द्वारा दरवाजा बंद होने या प्राप्तकर्ता के न मिलने के कारण वापस आता है, तो माननीय सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न नजीरों के अनुसार उसे विधिक रूप से तामील माना जाता है।
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अभियुक्त को अपनी बात साबित करने के लिए संबंधित पोस्टमैन को गवाह के रूप में बुलाने का अवसर भी दिया गया था, जिसका लाभ उसने नहीं उठाया.
इसके अतिरिक्त, अदालत ने पाया कि अभियुक्त ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के अंतर्गत दर्ज अपने बयानों में स्वयं चेक जारी करने, उस पर अपने हस्ताक्षर होने और खाते में पर्याप्त धनराशि न होने के कारण उसके बाउंस होने की बात को स्वीकार किया था।
अभियुक्त के बचाव साक्षी शरण बंसल के बयानों को भी न्यायालय ने संदिग्ध माना, क्योंकि उनके बयान अभियुक्त के स्वयं के बयानों से मेल नहीं खा रहे थे और वह अभियुक्त के घनिष्ठ मित्र भी थे।
अदालत ने माना कि परिवादी सागर कुमार ने चेक, बैंक रिटर्न मेमो, डाक रसीद और विधिक नोटिस जैसे पुख्ता दस्तावेजी साक्ष्यों के माध्यम से अपने मामले को संदेह से परे सिद्ध कर दिया है।न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अभियुक्त विधिक दायित्वों के निर्वहन से बचने में पूरी तरह असफल रहा।
इसके आधार पर अदालत ने अभियुक्त संजय शर्मा को धारा 138 पराक्रम्य लिखित अधिनियम के तहत दोषी पाते हुए दो वर्ष के कारावास और पाँच लाख सत्तर रुपये के आर्थिक दंड की सजा से दंडित किया।
वादी सागर कुमार की तरफ़ से प्रभावी पैरवी एडवोकेट अनिल कुमार अग्रवाल द्वारा की गई ।
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